हरसिद्धि की घटना ने खोली निगरानी की पोल, ठेले से लेकर फैक्ट्री तक जांच की जरूरत; जानिए आइसक्रीम कारोबार के लाइसेंस और नियम
मोतिहारी। पूर्वी चंपारण के हरसिद्धि थाना क्षेत्र के गायघाट हाईस्कूल के गेट के पास आइसक्रीम खाने के बाद करीब आधा दर्जन बच्चों के बीमार पड़ने की घटना ने ग्रामीण इलाकों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बच्चों ने आइसक्रीम खाने के तुरंत बाद मुंह में जलन होने और होंठ आपस में चिपकने की शिकायत की। एक बच्चे के होंठ से खून निकलने की बात भी सामने आई है। घटना के बाद परिजन बच्चों को इलाज के लिए अस्पताल ले गए। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर आइसक्रीम विक्रेता को पूछताछ के लिए थाने ले गई।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, कोटवा की बेस्ट चॉइस आइसक्रीम का ठेला लेकर एक व्यक्ति स्कूल के गेट के पास पहुंचा था। उज्जैनलोहियार गांव के सुमित कुमार ने बताया कि आइसक्रीम खाने के दौरान ही उसके मुंह में जलन होने लगी और दोनों होंठ आपस में चिपकने लगे। किसी तरह आइसक्रीम मुंह से बाहर निकालने पर उसके होंठ से खून निकलने लगा। देखते ही देखते पांच-छह अन्य बच्चे भी बीमार पड़ गए।
ग्रामीणों के बीच आइसक्रीम में किसी गलत केमिकल के इस्तेमाल की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, अब तक किसी हानिकारक पदार्थ की मिलावट की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बच्चों के बीमार होने का वास्तविक कारण जांच और जरूरत पड़ने पर आइसक्रीम के नमूने की प्रयोगशाला जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
हरसिद्धि थाना के अपर थानाध्यक्ष अविनाश कुमार के अनुसार, पुलिस मामले की जांच कर रही है और आइसक्रीम विक्रेता से पूछताछ की जा रही है।
सवाल सिर्फ एक ठेले का नहीं, पूरे कारोबार की निगरानी का है
गायघाट हाईस्कूल के पास हुई घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। गांवों और कस्बों में स्कूलों, बाजारों, चौक-चौराहों तथा सड़कों के किनारे ठेले पर आइसक्रीम बेचने वालों की संख्या काफी दिखाई देती है। गर्मी के मौसम में बच्चों के बीच इनकी मांग बढ़ जाती है। कम कीमत और आकर्षक रंगों वाली आइसक्रीम बच्चों को आसानी से आकर्षित करती है।
लेकिन उपभोक्ताओं के सामने अक्सर यह स्पष्ट नहीं होता कि आइसक्रीम कहां तैयार की गई है, किस कंपनी या निर्माता की है, उसकी गुणवत्ता की जांच हुई है या नहीं और उसे बेचने वाला खाद्य सुरक्षा के नियमों का पालन कर रहा है या नहीं।
खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य पदार्थों की आपूर्ति का पूरा नेटवर्क जांच के दायरे में होना चाहिए। ठेले पर बेचने वाला व्यक्ति किसी फैक्ट्री या थोक विक्रेता से आइसक्रीम खरीदकर बेच रहा हो सकता है। ऐसे में जांच केवल विक्रेता तक सीमित रखने के बजाय उत्पाद के निर्माता, सप्लायर, भंडारण और वितरण की कड़ियों तक पहुंचनी चाहिए।
हालांकि, इस घटना के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जिले के सभी आइसक्रीम विक्रेता नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं या संबंधित कारोबारी बिना लाइसेंस काम कर रहा था। इसका पता संबंधित दस्तावेजों की जांच से ही चलेगा। लेकिन बच्चों के बीमार पड़ने की घटना खाद्य सुरक्षा विभाग के लिए यह जांचने का अवसर जरूर है कि ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य कारोबार की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी है।
क्या आइसक्रीम बेचने के लिए लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन जरूरी है?
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत खाद्य कारोबार करने वालों को लागू नियमों के अनुसार भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अंतर्गत लाइसेंस या पंजीकरण लेना होता है। आइसक्रीम बनाने, पैक करने, थोक में बेचने, वितरण करने और खुदरा बिक्री करने वाले कारोबारियों की श्रेणी उनकी गतिविधि और लागू पात्रता मानदंडों के अनुसार तय होती है।
छोटे ठेले वाले और घूम-घूमकर खाद्य पदार्थ बेचने वाले विक्रेता भी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के दायरे में आते हैं। छोटे कारोबार के लिए पंजीकरण की व्यवस्था है, जबकि बड़े कारोबार और निर्धारित पात्रता के अनुसार अन्य श्रेणियों में लाइसेंस की आवश्यकता हो सकती है।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हर आइसक्रीम विक्रेता के लिए एक जैसी श्रेणी लागू नहीं होती। पैकबंद आइसक्रीम खरीदकर बेचने वाले खुदरा विक्रेता और आइसक्रीम का निर्माण करने वाली फैक्ट्री की कारोबारी गतिविधियां अलग हैं। इसलिए दोनों के दस्तावेजों और पात्रता की जांच भी उसी आधार पर होनी चाहिए।
एफएसएसएआई की संशोधित व्यवस्था के अनुसार, एक अप्रैल 2026 से सामान्य खाद्य कारोबारियों के लिए वार्षिक टर्नओवर की सीमा के आधार पर पंजीकरण और लाइसेंस की नई व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत सामान्य श्रेणी में 1.5 करोड़ रुपये तक वार्षिक टर्नओवर वाले कारोबार पंजीकरण, 1.5 करोड़ रुपये से अधिक और 50 करोड़ रुपये तक के कारोबार राज्य लाइसेंस तथा 50 करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार केंद्रीय लाइसेंस की श्रेणी में आते हैं। संबंधित खाद्य कारोबार की गतिविधि और विशेष पात्रता मानदंड भी देखना जरूरी है।
इसलिए केवल ठेला लगाने या कारोबार छोटा होने के आधार पर किसी विक्रेता को खाद्य सुरक्षा नियमों से बाहर नहीं माना जा सकता। इसी तरह, केवल लाइसेंस का नंबर होने से उत्पाद की गुणवत्ता की गारंटी भी नहीं मिलती। स्वच्छता, सही भंडारण और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन भी आवश्यक है।
कैसे बनता है आइसक्रीम कारोबार का लाइसेंस?
आइसक्रीम विक्रेता या निर्माता को अपनी कारोबारी गतिविधि के अनुसार एफएसएसएआई की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध फूड सेफ्टी कंप्लायंस सिस्टम यानी फॉसकॉस पोर्टल के माध्यम से आवेदन करना होता है।
पहला चरण : कारोबार की श्रेणी चुनना। आवेदक को बताना होता है कि वह आइसक्रीम का निर्माता है, पैकबंद उत्पादों का खुदरा विक्रेता है, वितरक है या किसी अन्य श्रेणी में कारोबार करता है।
दूसरा चरण : कारोबारी विवरण देना। कारोबार के नाम, संचालन स्थल, पते, संपर्क और लागू श्रेणी के अनुसार मांगी गई जानकारी भरनी होती है।
तीसरा चरण : आवश्यक दस्तावेज जमा करना। चुनी गई श्रेणी के अनुसार पहचान, पते, कारोबार और अन्य जरूरी दस्तावेज देने पड़ सकते हैं। निर्माण इकाई के मामले में उत्पादन स्थल, प्रक्रिया और लागू तकनीकी तथा स्वच्छता संबंधी शर्तें भी महत्वपूर्ण होती हैं।
चौथा चरण : आवेदन और शुल्क। पात्रता के अनुसार पंजीकरण या लाइसेंस का आवेदन जमा किया जाता है। संबंधित श्रेणी के लिए निर्धारित शुल्क और प्रक्रिया लागू होती है।
पांचवां चरण : नियमों का पालन और जांच। कारोबारी को लागू खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता, भंडारण और अन्य शर्तों का पालन करना होता है। विभाग नियमों और जोखिम के अनुसार निरीक्षण तथा कार्रवाई कर सकता है।
आवेदन और पात्रता की जानकारी आधिकारिक पोर्टल foscos.fssai.gov.in पर उपलब्ध है। आवेदन करते समय पुराने शुल्क या टर्नओवर की सीमा के बजाय आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध वर्तमान नियमों को देखना जरूरी है।
आइसक्रीम बनाने वाली फैक्ट्री की जांच क्यों जरूरी?
गायघाट की घटना में यदि जांच के दौरान आइसक्रीम की गुणवत्ता पर संदेह मिलता है, तो संबंधित उत्पाद का नमूना लेकर अधिकृत प्रयोगशाला में जांच कराना महत्वपूर्ण होगा। जरूरत पड़ने पर पुलिस और खाद्य सुरक्षा विभाग को उत्पाद के स्रोत का पता लगाना चाहिए।
जांच में यह देखा जाना चाहिए कि आइसक्रीम किस इकाई में तैयार हुई, क्या निर्माता के पास लागू पंजीकरण या लाइसेंस है, निर्माण में इस्तेमाल सामग्री खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप है या नहीं और तैयार उत्पाद को किस तापमान पर रखा तथा पहुंचाया गया।
आइसक्रीम जैसे जमे हुए उत्पादों के लिए उचित तापमान पर भंडारण और परिवहन महत्वपूर्ण हैं। तापमान में गड़बड़ी से उत्पाद की गुणवत्ता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। वहीं, मुंह में अचानक जलन या होंठ से खून आने जैसी शिकायतों का कारण केवल लक्षणों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए चिकित्सकीय आकलन और वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
यदि नमूने में प्रतिबंधित या हानिकारक पदार्थ मिलता है, अथवा किसी अन्य खाद्य सुरक्षा उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित निर्माता, वितरक या विक्रेता की भूमिका के अनुसार कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
ग्रामीण इलाकों में खाद्य सुरक्षा विभाग की निगरानी कितनी प्रभावी?
ग्रामीण क्षेत्रों में ठेले पर बिकने वाले खाद्य पदार्थों तक निगरानी पहुंचाना बड़ी चुनौती हो सकती है। मोबाइल विक्रेता अलग-अलग गांवों, स्कूलों और बाजारों में घूमते हैं। ऐसे में केवल स्थायी दुकानों का निरीक्षण पर्याप्त नहीं है।
खाद्य सुरक्षा विभाग को स्कूलों के आसपास लगने वाले खाद्य ठेलों, साप्ताहिक हाट, ग्रामीण बाजारों और स्थानीय वितरण केंद्रों की जोखिम आधारित जांच पर ध्यान देना चाहिए। संदिग्ध उत्पादों के नमूने लिए जाने चाहिए और शिकायत मिलने पर समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।
स्कूलों के आसपास खाद्य पदार्थ बेचने वालों के लिए जागरूकता अभियान भी जरूरी है। स्कूल प्रबंधन, अभिभावकों और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय से संदिग्ध उत्पादों की सूचना समय पर संबंधित विभाग तक पहुंचाई जा सकती है।
इसके साथ ही, प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि छोटे विक्रेताओं को पंजीकरण की प्रक्रिया समझ में आती है या नहीं। नियमों का पालन कराने के साथ उन्हें सही जानकारी उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। लेकिन जहां खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां कारोबार छोटा होने के आधार पर लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अभिभावक कैसे बरतें सावधानी?
बच्चों को आइसक्रीम या कोई भी पैकबंद खाद्य पदार्थ खरीदते समय उत्पाद का नाम, निर्माता का विवरण, बैच नंबर, तारीख और उपलब्ध खाद्य सुरक्षा संबंधी जानकारी देखने की आदत डालनी चाहिए। खुली या बिना स्पष्ट पहचान वाली आइसक्रीम खरीदते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।
यदि किसी खाद्य पदार्थ को खाने के बाद मुंह में जलन, सूजन, उल्टी, सांस लेने में परेशानी या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो बच्चे को तुरंत चिकित्सकीय सहायता दिलानी चाहिए। संदिग्ध उत्पाद को सुरक्षित तरीके से अलग रखा जा सकता है, ताकि जांच की जरूरत पड़ने पर उसकी पहचान की जा सके। उसे दोबारा खाने या दूसरे बच्चों को देने से बचना चाहिए।
अब इन सवालों के जवाब जरूरी
हरसिद्धि की घटना के बाद प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग के सामने कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं। क्या संबंधित आइसक्रीम विक्रेता के पास लागू पंजीकरण या लाइसेंस है? आइसक्रीम किस निर्माता या सप्लायर से लाई गई थी? क्या उत्पाद का नमूना लेकर प्रयोगशाला जांच कराई जाएगी? क्या जिले के ग्रामीण इलाकों में चल रहे आइसक्रीम कारोबार का सर्वेक्षण और निरीक्षण किया जाएगा? और क्या स्कूलों के आसपास बिकने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कोई नियमित व्यवस्था है?
इन सवालों का जवाब केवल एक घटना की जांच के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी जरूरी है।
गायघाट हाईस्कूल के पास बच्चों के बीमार पड़ने की घटना को गंभीरता से लेते हुए जांच का दायरा ठेले से आगे बढ़ाकर उत्पाद के निर्माण और वितरण तक पहुंचाना चाहिए। जब तक जांच में वास्तविक कारण सामने नहीं आता, तब तक मिलावट या गलत केमिकल के इस्तेमाल को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। लेकिन घटना के बाद खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीण बाजारों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों की नियमित निगरानी और पारदर्शी जांच ही ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने में मदद कर सकती है।
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