वर्षों से हर रात पहुंचाते हैं खाना-दवा, परित्यक्त मरीजों के लिए बने इंसानियत का सहारा
जिनके पास बीमारी की हालत में देखभाल करने वाला कोई अपना नहीं होता। ऐसे मरीजों के लिए गुरमीत सिंह
वर्षों से उम्मीद और अपनत्व का चेहरा बने हुए हैं।
गुरमीत सिंह रात में नियमित रूप से इन मरीजों के बीच पहुंचते हैं। उनके हाथ में भोजन और दवाएं होती हैं,
लेकिन मरीजों के लिए उनकी सबसे बड़ी सौगात शायद वह अपनापन है, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
मैं परित्यक्त लोगों को नहीं छोड़ सकता।
पहला सवाल—दर्द तो नहीं हो रहा?
गुरमीत की सेवा की खास बात केवल भोजन या दवा पहुंचाना नहीं है। वह मरीजों से उनका हाल पूछते हैं,
उनके दर्द को समझने की कोशिश करते हैं और उनके साथ परिवार के सदस्य जैसा व्यवहार करते हैं।
वर्षों पहले प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों में बताया गया था कि गुरमीत रात में पीएमसीएच के परित्यक्त
मरीजों के वार्ड में पहुंचकर उन्हें खाना देते हैं और जरूरतमंदों की दवाओं की व्यवस्था में भी मदद करते हैं।
जिन मरीजों के पास बीमारी के समय अपना कोई नहीं होता, उनके लिए गुरमीत का पहुंचना किसी अपने के आने जैसा है।
कमाई का हिस्सा मरीजों की सेवा में
गुरमीत सिंह कपड़े का कारोबार करते हैं। वर्ष 2016 में प्रकाशित द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के
अनुसार, गुरमीत अपने परिवार के साथ मिलकर अपनी कमाई का करीब 10 प्रतिशत जरूरतमंद मरीजों की सेवा में
खर्च करते थे।
उनकी सेवा भोजन तक सीमित नहीं रही। जरूरतमंद मरीजों के लिए दवा और अन्य आवश्यक मदद उपलब्ध कराने में
भी उन्होंने भूमिका निभाई। इसी वजह से परित्यक्त वार्ड के मरीजों के बीच उनका एक अलग रिश्ता बन गया।
इंसानियत की एक मिसाल
जब अपनों ने साथ छोड़ दिया, तब किसी अनजान व्यक्ति का दर्द अपना समझकर उसके पास पहुंचना
अपने आप में बड़ी बात है। गुरमीत सिंह की कहानी बताती है कि सेवा केवल पैसे देने का नाम नहीं,
बल्कि किसी अकेले इंसान को यह एहसास कराने का नाम भी है कि वह अकेला नहीं है।
सेवा को मिली पहचान
गुरमीत सिंह की सेवा को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। 2016 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार,
उन्हें ‘सिख्स इन सेवा’ श्रेणी के वर्ल्ड सिख अवार्ड के लिए आमंत्रित किया गया था।
उनके लिए यह सेवा किसी प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि उन लोगों की मदद करने की कोशिश है जिन्हें
जिंदगी ने पहले ही अकेला कर दिया है।
जिन मरीजों के लिए अस्पताल में कोई अपना नहीं,
उनके लिए गुरमीत सिंह वर्षों से रात का सहारा बने हुए हैं।
में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तैयार की गई है। वायरल संदेश में बताए गए कुछ आंकड़ों को वर्तमान तथ्य
के रूप में स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया गया है।
