– धीरज श्रीवास्तव-
दिनांक: 18 मार्च 2025
पूर्वी चंपारण, बिहार: बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में नक्सल गतिविधियों के खिलाफ पुलिस ने एक और बड़ी सफलता हासिल की है। 17 मार्च 2025 को, बिहार पुलिस के विशेष कार्य बल (STF) और जिला पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई में पताही थाना क्षेत्र के परसौनी कपूर गांव से कुख्यात नक्सली बलीराम सहनी को गिरफ्तार किया। बिहार पुलिस ने इसे नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि इससे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन यह घटना सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं है—यह पूर्वी चंपारण के नक्सल इतिहास के उस लंबे सफर का हिस्सा है, जो सामाजिक-आर्थिक असमानताओं और विद्रोह की कहानी बयां करता है। बता दे कि बलिराम की संलिप्तता चकिया में रेल ट्रैक उड़ाने सहित कई मामलों में सामने रही। पुलिस उसको लंबे अरसे से तलाश रही थी।
बलीराम सहनी की गिरफ्तारी: ताजा घटनाक्रम
- 17 मार्च को बिहार पुलिस ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर घोषणा की कि बलीराम सहनी, जो लंबे समय से वांछित था, को पताही क्षेत्र से धर दबोचा गया। पुलिस सूत्रों के अनुसार, बलीराम पर कई आपराधिक मामले दर्ज थे, और वह नक्सली संगठनों के लिए एक अहम कड़ी माना जाता था। उसकी गिरफ्तारी से न केवल नक्सली गतिविधियों को झटका लगा है, बल्कि पुलिस को क्षेत्र के नक्सली नेटवर्क की और जानकारी मिलने की उम्मीद है। पूछताछ जारी है, और यह खुलासा हो सकता है कि वह किन-किन घटनाओं में शामिल रहा। संभावना जताई जा रही है कि बलीराम रेलवे ट्रैक या अन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की साजिशों में संलिप्त हो सकता है, जैसा कि अतीत में अन्य नक्सलियों के साथ देखा गया।
पूर्वी चंपारण और नक्सलवाद: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
पूर्वी चंपारण, जो कभी महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह (1917) का गवाह बना था, नक्सल आंदोलन के लिए भी उर्वर भूमि रहा है। 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सल आंदोलन धीरे-धीरे बिहार के ग्रामीण इलाकों में फैला। 1970 के दशक में पूर्वी चंपारण के जंगलों और गांवों में नक्सलियों ने अपनी जड़ें जमाईं। यहाँ की गरीबी, भूमि असमानता और सामाजिक शोषण ने इस आंदोलन को बढ़ावा दिया। चकिया, मधुबन और पताही जैसे क्षेत्र नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने बन गए। 1970 और 1980 के दशक में नक्सलियों ने जमींदारों और धनी किसानों के खिलाफ हिंसक कार्रवाइयाँ कीं। इसके बाद 1990 के दशक तक यह आंदोलन बिहार के कई हिस्सों में फैल गया। पूर्वी चंपारण में नक्सलियों की गतिविधियाँ कभी-कभी पुलिस चौकियों पर हमले, तो कभी लेवी वसूली तक सीमित रहीं। 2017 में परसौनी कपूर गाँव से नक्सली संजय साहनी की गिरफ्तारी इसका एक उदाहरण है, जब वह रेलवे ट्रैक उड़ाने की साजिश में पकड़ा गया था। हालांकि, पिछले दो दशकों में पुलिस और सरकार की सख्ती से नक्सल प्रभाव कम हुआ है। 2021 में गृह मंत्रालय ने पूर्वी चंपारण को नक्सल-मुक्त घोषित किया था, लेकिन बलीराम सहनी जैसे व्यक्तियों की मौजूदगी बताती है कि यहाँ नक्सलवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। बिहार सरकार का दावा है कि 2025 तक राज्य को नक्सल-मुक्त बनाया जाएगा, और इस दिशा में कार्रवाइयाँ तेज हो रही हैं।
बलीराम सहनी की भूमिका: क्या कहते हैं संकेत?बलीराम सहनी को पुलिस ने “कुख्यात” बताया है, जो संकेत देता है कि वह कोई साधारण नक्सली नहीं था। जानकारों का मानना है कि वह संगठन में धन जुटाने, हथियारों की सप्लाई या हिंसक हमलों की योजना बनाने में शामिल हो सकता है। उसकी गिरफ्तारी से पहले वह पुलिस की नजरों से बचता रहा, जो उसके अनुभव और संगठनात्मक कौशल को दर्शाता है। यह भी संभव है कि 2021 के बाद, जब जिला नक्सल-मुक्त घोषित हुआ, उसने छोटे स्तर पर नक्सली गतिविधियों को फिर से संगठित करने की कोशिश की हो।
आगे की राह
बलीराम सहनी की गिरफ्तारी नक्सलियों के लिए एक झटका है, लेकिन यह सवाल उठता है—क्या यह नक्सलवाद का अंत है या सिर्फ एक पड़ाव? पूर्वी चंपारण में गरीबी और बेरोजगारी जैसे मूल कारण अभी भी मौजूद हैं, जो नक्सलवाद को जन्म देते हैं। सरकार की ओर से भूमि सुधार और विकास योजनाएँ लागू की जा रही हैं, लेकिन इनका असर गाँवों तक पूरी तरह नहीं पहुँचा। इस बीच, बिहार पुलिस का यह ऑपरेशन नक्सलियों को चेतावनी है कि कानून का शिकंजा उन तक पहुँच रहा है। पाठकों के लिए यह खबर न सिर्फ एक ब्रेकिंग न्यूज़ है, बल्कि पूर्वी चंपारण के उस इतिहास को समझने का मौका भी, जो शांति और संघर्ष के बीच झूलता रहा है।
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