आशा कुमारी
1999 का कारगिल युद्ध भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसने हर सैनिक के दिल में देशभक्ति की लौ को और प्रज्वलित किया। यह कहानी है एक ऐसे सैनिक की, जो पाकिस्तान सीमा पर तैनात था, और जिसके हौसले ने न केवल युद्ध के मैदान में, बल्कि परिवार के प्रति जिम्मेदारी को भी मजबूत किया। जैसे ही युद्ध का अलार्म बजा, सीमा पर तैनात सैनिक तुरंत अलर्ट मोड में आ गए, और उनके दिल में बस एक ही संकल्प था—देश की रक्षा, हर कीमत पर।
मोतिहारी, बिहार: बिहार के मोतिहारी जिले के हरसिद्धि थाना क्षेत्र, उज्जैनलोहियार के घुसियाड़ गांव के निवासी सुरेश सिंह के इकलौते पुत्र, रिटायर्ड सैनिक डॉ. आर.बी. शर्मा उस समय जैसलमेर बॉर्डर पर तैनात थे। आज भी उनकी आंखों में उस युद्ध की यादें ताजा हैं। वे बताते हैं, “जून 1999 में कारगिल युद्ध की शुरुआत हुई। मैं अपनी टुकड़ी के साथ दोपहर में खाना खा रहा था। तभी अचानक अधिकारियों ने सूचना दी कि कारगिल सीमा पर पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ गया है। हमें तुरंत अलर्ट मोड में बॉर्डर पर तैनात होने का आदेश मिला।”
मेडिकल कोर में कार्यरत डॉ. शर्मा ने अपने साथियों के साथ बिना देर किए सीमा पर अपनी जिम्मेदारी संभाली। वे कहते हैं, “उस समय हर सैनिक के मन में एक ही जज्बा था—इस बार आर-पार की लड़ाई होगी। हमारा मनोबल इतना ऊंचा था कि दुश्मन की हर चाल को नाकाम करने की ठान चुके थे।” मेडिकल कोर होने के नाते उनकी जिम्मेदारी थी घायल सैनिकों का इलाज करना और उनकी जान बचाना। रात-दिन, ठंड और मुश्किल हालातों में भी वे अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे।
डॉ. शर्मा बताते हैं कि वे युद्ध शुरू होने से छह महीने पहले घर से निकले थे। घर पर उनकी पत्नी आभा सिन्हा, दो साल का बेटा, दो छोटी बेटियां और बुजुर्ग माता-पिता थे। युद्ध के दौरान एक रात उन्हें पत्नी से फोन पर बात करने का मौका मिला। आभा ने हिम्मत बंधाते हुए कहा, “आप देश के लिए लड़ें, बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी मैं संभाल लूंगी। बस आप सुरक्षित रहें और देश का मान बढ़ाएं।” पत्नी की ये बातें सुनकर डॉ. शर्मा का हौसला दोगुना हो गया। वे कहते हैं, “उस एक बातचीत ने मुझे इतनी ताकत दी कि मैं हर मुश्किल से लड़ने को तैयार था।”
युद्ध के दौरान जैसलमेर बॉर्डर पर भी तनाव का माहौल था। हर पल यह खबर आती कि कारगिल में हमारे सैनिक दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं। डॉ. शर्मा और उनकी टुकड़ी दिन-रात सतर्क रहते, ताकि किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रहें। युद्ध खत्म होने के बाद, पांच महीने बाद जब वे घर लौटे, तो पत्नी आभा ने उनकी आरती उतारी और बच्चों ने गले लगकर उनका स्वागत किया। वे कहते हैं, “उस पल की खुशी को शब्दों में बयां करना मुश्किल है।”
आज रिटायर्ड सैनिक डॉ. आर.बी. शर्मा पाकिस्तान के खिलाफ हुए हवाई हमलों की खबर सुनकर रोमांचित हो उठते हैं। वे कहते हैं, “आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना हमारा धर्म है। कारगिल युद्ध की यादें आज भी मेरे दिल में ताजा हैं। अगर देश को मेरी जरूरत पड़े, तो मैं आज भी सीमा पर जाने के लिए तैयार हूं।” उनकी ये बातें न केवल उनके अटूट जज्बे को दर्शाती हैं, बल्कि हर भारतीय को देशभक्ति के लिए प्रेरित करती हैं।
