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12 घंटे की ड्यूटी, छुट्टी पर वेतन कटौती का आरोप; सूरत से बिहार-UP लौट रहे मजदूर, ‘गांव चलो आंदोलन’ ने बढ़ाई चिंता

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सूरत/बिहार। गुजरात के सूरत में काम करने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूरों की घर वापसी इन दिनों चर्चा में है। टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी उद्योग में काम करने वाले कामगारों के बीच काम के घंटे, साप्ताहिक छुट्टी और वेतन को लेकर असंतोष बढ़ने के बीच ‘गांव चलो आंदोलन’ की अपील ने मामले को नया मोड़ दे दिया है। मजदूरों के एक वर्ग का कहना है कि जब तक काम करने की परिस्थितियों में सुधार नहीं होता, तब तक वे गांव में रहकर ही दूसरे विकल्प तलाशेंगे।

अक्टूबर 2026 के शुरुआती दिनों से इस अभियान को लेकर खबरें सामने आ रही हैं। हालांकि, मजदूरों की वापसी में श्रम विवाद के साथ दीपावली और छठ पूजा का भी योगदान है। ऐसे में हर घर लौटने वाले मजदूर को आंदोलन का हिस्सा मानना सही नहीं होगा।

12 घंटे काम कराने और साप्ताहिक छुट्टी नहीं देने का आरोप

सूरत के कपड़ा और एम्ब्रॉयडरी उद्योग में काम करने वाले मजदूरों का आरोप है कि उनसे निर्धारित आठ घंटे के बजाय 12 घंटे तक काम कराया जाता है। कई कामगारों के मुताबिक, व्यस्त समय में लगातार काम करने का दबाव रहता है और साप्ताहिक छुट्टी मांगना भी आसान नहीं है।

मजदूरों की शिकायत है कि बीमारी या पारिवारिक जरूरत के कारण छुट्टी मांगने पर वेतन काटने, भुगतान रोकने अथवा नौकरी से निकालने की आशंका बनी रहती है। कुछ कामगारों ने ओवरटाइम के भुगतान और वेतन समय पर नहीं मिलने की भी शिकायत की है।

हालांकि, ये आरोप मजदूरों और उनके प्रतिनिधियों की ओर से लगाए गए हैं। सभी औद्योगिक इकाइयों में एक जैसी स्थिति होने या हर शिकायत के सही पाए जाने की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती।

क्या है ‘गांव चलो आंदोलन’?

‘गांव चलो आंदोलन’ सूरत के प्रवासी मजदूरों के बीच श्रम संबंधी मांगों को लेकर शुरू किया गया अभियान है। मजदूर प्रतिनिधि अजय दुबे ने अक्टूबर की शुरुआत में कामगारों से अपील की थी कि यदि उनकी मांगों पर अमल नहीं होता है तो वे कुछ समय के लिए अपने गांव लौटने पर विचार करें।

3 अक्टूबर 2026 की टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन को श्रम विभाग के निर्देश के बाद वापस लिया गया था। लेकिन इसके बाद मजदूर प्रतिनिधियों ने फिर आंदोलन की अपील की। उनका कहना था कि विभागीय निर्देश जारी होने के बावजूद कई कामगारों को मांगों पर ठोस अमल होता नहीं दिख रहा है।

अभियान के तहत मजदूरों को प्रबंधन से बातचीत करने, श्रम अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज कराने और नियमों का पालन करने वाली इकाइयों में काम तलाशने जैसे विकल्प भी सुझाए गए। रविवार को साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलने की स्थिति में सामूहिक विरोध की अपील भी की गई।

आठ घंटे की ड्यूटी, रविवार को छुट्टी और समय पर वेतन की मांग

यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ है। सितंबर 2026 में भी सूरत के मजदूरों ने जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर आठ घंटे की ड्यूटी, रविवार को साप्ताहिक अवकाश और श्रम कानूनों के पालन की मांग उठाई थी।

इंडियन एक्सप्रेस की 13 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, मजदूरों ने आरोप लगाया था कि पहले आश्वासन मिलने के बावजूद उन्हें आठ घंटे से अधिक काम करना पड़ रहा है। जनभूमि भारत मजदूर यूनियन ने प्रत्येक महीने की सात तारीख तक वेतन भुगतान और पीएफ, ईएसआई तथा ग्रेच्युटी जैसे लागू लाभों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग भी उठाई थी।

मजदूरों की मांग है कि काम के घंटे निर्धारित हों, साप्ताहिक छुट्टी मिले और वेतन का भुगतान समय पर किया जाए। साथ ही, श्रम कानूनों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाए।

उद्योग मालिकों का पक्ष भी अहम

श्रम विवाद का दूसरा पक्ष उद्योग संचालकों की चिंताएं हैं। सितंबर में इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक एम्ब्रॉयडरी इकाई के मालिक ने कहा था कि बिजली संबंधी समस्या के कारण उनकी इकाई में गुरुवार को साप्ताहिक अवकाश दिया जाता है। उनके मुताबिक, रविवार को भी छुट्टी देने से उत्पादन और कारोबार प्रभावित हो सकता है।

इससे स्पष्ट है कि विवाद केवल छुट्टी की मांग तक सीमित नहीं है। कामगारों के अधिकारों और उद्योग की उत्पादन व्यवस्था के बीच सहमति बनाना भी प्रशासन के सामने चुनौती है। हालांकि, उद्योग संचालकों की यह दलील मजदूरों की शिकायतों की जांच और श्रम कानूनों के पालन की जरूरत को समाप्त नहीं करती।

दीपावली और छठ पूजा ने बढ़ाई घर वापसी

बिहार और उत्तर प्रदेश के बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए सूरत जैसे औद्योगिक शहरों में रहते हैं। दीपावली और छठ पूजा के दौरान उनका अपने गांव लौटना सामान्य परंपरा रही है। अक्टूबर में भी त्योहारी यात्रा शुरू होने से रेलवे स्टेशनों पर भीड़ बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।

इस बार फर्क यह है कि त्योहारों से पहले ही मजदूरों के बीच श्रम विवाद और ‘गांव चलो आंदोलन’ की चर्चा तेज हो गई है। मजदूर प्रतिनिधियों की अपील और त्योहार पर घर लौटने की इच्छा एक ही समय पर सामने आने से दोनों कारण एक-दूसरे से जुड़े दिखाई दे रहे हैं।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह तय करना संभव नहीं है कि घर लौटने वाले कुल मजदूरों में कितने लोग आंदोलन के कारण जा रहे हैं और कितने केवल त्योहार मनाने के लिए।

क्या 10 लाख मजदूर सूरत छोड़ चुके हैं?

कुछ मीडिया रिपोर्टों में सूरत से करीब 10 लाख मजदूरों के लौटने या लौटने की तैयारी करने का दावा किया गया है। लेकिन इस संख्या की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती। इसलिए इसे प्रमाणित आंकड़ा मानकर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

मनीकंट्रोल हिंदी की 14 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में भी 10 लाख तक मजदूरों के शामिल होने की बात को कुछ खबरों में किए गए दावे के रूप में बताया गया है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि श्रम विवाद और सामान्य त्योहारी पलायन, दोनों का असर हो सकता है।

ऐसे में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सूरत के प्रवासी मजदूरों के बीच श्रम संबंधी असंतोष और घर वापसी की चर्चा तेज है। वास्तविक पलायन का पैमाना जानने के लिए रेलवे के आंकड़े, प्रशासनिक जानकारी और उद्योग संगठनों के आधिकारिक बयान जरूरी होंगे।

मजदूरों की वापसी का उद्योग पर क्या असर पड़ेगा?

सूरत का टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी क्षेत्र बड़ी संख्या में प्रवासी कामगारों पर निर्भर है। यदि बड़ी संख्या में कामगार लंबे समय तक वापस नहीं लौटते हैं, तो इकाइयों में श्रमिकों की कमी, उत्पादन में देरी और कारोबार पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, मौजूदा समय में इस आंदोलन के कारण उद्योग को हुए कुल नुकसान का कोई पुष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

दूसरी ओर, यदि मजदूरों की मांगों पर सहमति बनती है और काम की परिस्थितियों में सुधार होता है, तो इससे श्रमिकों को राहत मिलने के साथ औद्योगिक संबंधों में भी स्थिरता आ सकती है।

अब निगाहें श्रम विभाग और प्रशासन पर

सूरत में चल रहा यह घटनाक्रम प्रवासी मजदूरों के अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक रोजगार की परिस्थितियों से जुड़ा बड़ा सवाल उठाता है। मजदूर बेहतर कार्य परिस्थितियों और छुट्टी की मांग कर रहे हैं, जबकि उद्योग संचालकों को उत्पादन और लागत की चिंता है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि श्रम विभाग के निर्देशों का कितना पालन होता है, शिकायतों पर क्या कार्रवाई की जाती है और मजदूरों की मांगों पर उद्योग संचालकों के साथ कोई ठोस सहमति बन पाती है या नहीं। फिलहाल, ‘गांव चलो आंदोलन’ ने सूरत के औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिकों की समस्याओं को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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