मोतिहारी: पूर्वी चंपारण में सरकारी जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने राजस्व प्रशासन से लेकर निबंधन विभाग तक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मीडिया के हाथ लगे सरकारी दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि सदर अंचल के बैरिया मौजा स्थित खाता संख्या-109 की गैरमजरूआ (सरकारी) भूमि को जिला स्तरीय समिति के निर्णय के बाद निबंधन रोक सूची (Prohibitory List) से मुक्त कर दिया गया। इसके बाद उक्त जमीन की रजिस्ट्री भी शुरू हो गई।
सबसे अहम बात यह है कि रोक सूची से मुक्त करने संबंधी समिति की अनुशंसा पर तत्कालीन जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल के अनुमोदन का भी उल्लेख सरकारी पत्राचार में किया गया है। यदि दस्तावेजों में दर्ज तथ्य सही हैं तो यह मामला जिले के सबसे बड़े भूमि घोटालों में शामिल हो सकता है।
सरकारी रिकॉर्ड में गैरमजरूआ, फिर कैसे खुल गया निबंधन?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार सदर अंचल के बैरिया मौजा के खाता संख्या-109 की भूमि राजस्व अभिलेखों में गैरमजरूआ (सरकारी) भूमि के रूप में दर्ज है। इसी खाता की लगभग पांच बीघा जमीन सहित अन्य कई खेसरों को निबंधन विभाग की रोक सूची से मुक्त करने का प्रस्ताव जिला स्तरीय समिति के समक्ष रखा गया।
समिति ने प्रस्ताव को स्वीकृति दी और उसके बाद संबंधित जमीन की खरीद-बिक्री का रास्ता साफ हो गया। सवाल यह है कि यदि भूमि सरकारी थी तो उसकी बिक्री की अनुमति किस आधार पर दी गई?
किन अधिकारियों ने लिया फैसला?
दस्तावेज बताते हैं कि रोक सूची से जमीन हटाने वाली जिला स्तरीय समिति में पांच अधिकारी शामिल थे। इनमें—
- सदर एसडीएम
- सदर डीसीएलआर
- संबंधित अंचलाधिकारी (सीओ)
- जिला अवर निबंधक
- अपर समाहर्ता
समिति की अनुशंसा पर सभी अधिकारियों के हस्ताक्षर मौजूद हैं।
अपर समाहर्ता का पत्र और डीएम के अनुमोदन का उल्लेख
मीडिया के पास मौजूद ज्ञापांक-5752, दिनांक 12 दिसंबर 2025 के पत्र में अपर समाहर्ता ने जिला अवर निबंधक को लिखा है कि जिला स्तरीय समिति के निर्णय के आलोक में संबंधित खेसरों को निबंधन रोक सूची से मुक्त किया जाए।
इसी पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि “जिलाधिकारी महोदय का अनुमोदन प्राप्त है।” यानी समिति की अनुशंसा को तत्कालीन जिलाधिकारी की स्वीकृति मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट के आदेश का हवाला भी शामिल
समिति की रिपोर्ट में पटना हाईकोर्ट के आदेश का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि संबंधित भूमि के निबंधन में बाधा उत्पन्न नहीं की जाए। इसी आधार पर कई खेसरों को रोक सूची से हटाने की अनुशंसा की गई।
हालांकि दस्तावेज यह स्पष्ट नहीं करते कि गैरमजरूआ दर्ज भूमि को निजी संपत्ति मानने का आधार क्या था।
करीब 50 करोड़ रुपये की जमीन का मामला
स्थानीय बाजार दर के अनुसार बैरिया क्षेत्र में एक कट्ठा जमीन की कीमत लगभग 50 लाख रुपये बताई जाती है। यदि लगभग पांच बीघा (करीब 100 कट्ठा) भूमि की बात करें तो उसकी अनुमानित बाजार कीमत करीब 50 करोड़ रुपये बैठती है। यही कारण है कि इस पूरे मामले को जिले का सबसे बड़ा संभावित लैंड स्कैम बताया जा रहा है।
वर्तमान डीएम ने की कार्रवाई, लेकिन सवाल बाकी
मामले में अनियमितता की आशंका के बाद वर्तमान जिलाधिकारी सौरभ सुमन यादव ने संबंधित राजस्व कर्मचारी को निलंबित कर दिया है। लेकिन सवाल यह है कि यदि पूरी प्रक्रिया जिला स्तरीय समिति और उच्च अधिकारियों के अनुमोदन से हुई थी, तो कार्रवाई सिर्फ एक राजस्व कर्मचारी तक ही क्यों सीमित है?
पूरे मामले का सबसे अहम सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या निबंधन रोक सूची से जमीन हटाने से पहले संबंधित अंचलाधिकारी से विधिवत रिपोर्ट तलब की गई थी?
यदि रिपोर्ट मंगाई गई थी तो उसमें खाता संख्या-109 की भूमि की प्रकृति क्या बताई गई थी? क्या अंचल कार्यालय ने इसे गैरमजरूआ सरकारी भूमि बताया था या निजी भूमि?
और यदि अंचल से कोई रिपोर्ट ली ही नहीं गई, तो जिला स्तरीय समिति ने आखिर किस आधार पर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज भूमि को रोक सूची से मुक्त कर दिया?
राजस्व मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी विवादित या प्रतिबंधित भूमि को रोक सूची से हटाने से पहले संबंधित अंचल कार्यालय की रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में इस रिपोर्ट की भूमिका पूरे मामले की जांच का सबसे अहम बिंदु बन सकती है।
अब इन सवालों का जवाब कौन देगा?
- क्या खाता संख्या-109 की जमीन सरकारी रिकॉर्ड में गैरमजरूआ दर्ज है?
- क्या समिति के निर्णय से पहले अंचलाधिकारी से रिपोर्ट मांगी गई थी?
- यदि रिपोर्ट में जमीन सरकारी थी तो बिक्री की अनुमति क्यों दी गई?
- यदि रिपोर्ट नहीं ली गई तो समिति ने किस आधार पर निर्णय लिया?
- क्या तत्कालीन जिलाधिकारी के अनुमोदन से पहले पूरे रिकॉर्ड का सत्यापन कराया गया था?
- क्या हाईकोर्ट के आदेश की आड़ में सरकारी भूमि की बिक्री की अनुमति दी गई?
- यदि वर्तमान जांच में गड़बड़ी सामने आ रही है तो केवल राजस्व कर्मचारी ही कार्रवाई का पात्र क्यों बना?
- क्या समिति के सदस्यों और अनुमोदन देने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी?
जांच से ही साफ होगी तस्वीर
यह मामला अब केवल एक जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रह गया है। उपलब्ध दस्तावेज कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। यदि सरकारी जमीन की बिक्री नियमों के विरुद्ध हुई है तो पूरे निर्णय लेने की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच जरूरी है। वहीं यदि सभी निर्णय विधिसम्मत थे तो संबंधित अधिकारियों को भी सार्वजनिक रूप से पूरे मामले का तथ्यात्मक पक्ष सामने रखना चाहिए।
Disclaimer: यह समाचार मीडिया को उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों, राजस्व अभिलेखों और विभागीय पत्राचार के आधार पर तैयार किया गया है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर तथ्य और उठ रहे सवालों को सामने लाना है। यदि संबंधित अधिकारी, विभाग या अन्य पक्ष अपना स्पष्टीकरण देना चाहते हैं तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
