पूर्वी चंपारण के 20 कार्यों की तकनीकी स्वीकृति में नियमों की अनदेखी पर कैग की आपत्ति, जुलाई 2025 में विभाग ने स्वीकार किया था ऑडिट निष्कर्ष; विधानसभा में 23 जुलाई 2026 को पेश हुई रिपोर्ट
मोतिहारी। पूर्वी चंपारण में मनरेगा के तहत कराए गए 20 कार्यों की तकनीकी स्वीकृति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। इन कार्यों की अनुमानित लागत 4.95 करोड़ रुपये थी। विभागीय निर्देशों के अनुसार 10 लाख रुपये से अधिक लागत वाले कार्यों की तकनीकी स्वीकृति कार्यपालक अभियंता को देनी थी, लेकिन जिले के मनरेगा सहायक अभियंता ने ही सभी 20 कार्यों को मंजूरी दे दी। इतना ही नहीं, तकनीकी स्वीकृति देने वाले अधिकारी के पास ही इन कार्यों के निष्पादन की जिम्मेदारी भी थी। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने इसे विभागीय निर्देशों का उल्लंघन और उच्चाधिकारी की स्वीकृति से बचने का मामला माना है।
यह मामला कैग की बिहार सरकार से संबंधित रिपोर्ट संख्या 01/2026 में दर्ज है। रिपोर्ट का निष्कर्ष पूर्वी चंपारण में मनरेगा के अभिलेखों की जांच के दौरान सामने आया। खास बात यह है कि विभाग ने जुलाई 2025 में इस ऑडिट आपत्ति को स्वीकार कर लिया था। अब यह रिपोर्ट बिहार विधानमंडल के पटल पर भी रखी जा चुकी है। इसके बाद संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही और मामले में हुई कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
10 लाख से अधिक के कार्यों की स्वीकृति का अधिकार किसके पास था?
कैग की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण विकास विभाग ने मार्च 2019 में तकनीकी स्वीकृति को लेकर निर्देश जारी किए थे। इसके तहत 10 लाख रुपये तक की अनुमानित लागत वाले मनरेगा कार्यों की तकनीकी स्वीकृति संबंधित सहायक अभियंता दे सकते थे। वहीं, 10 लाख रुपये से अधिक और एक करोड़ रुपये तक की लागत वाले कार्यों की स्वीकृति देने का अधिकार कार्यपालक अभियंता को दिया गया था।
ऑडिट के दौरान पाया गया कि पूर्वी चंपारण के मनरेगा सहायक अभियंता ने वर्ष 2020-21 में 20 ऐसे कार्यों की तकनीकी स्वीकृति दे दी, जिनमें प्रत्येक कार्य की अनुमानित लागत 10 लाख रुपये से अधिक थी। नियमानुसार इन कार्यों को तकनीकी स्वीकृति के लिए कार्यपालक अभियंता के पास भेजा जाना चाहिए था।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किया। जिन 20 कार्यों की तकनीकी स्वीकृति सहायक अभियंता ने दी थी, उन्हीं कार्यों के निष्पादन की जिम्मेदारी भी उनके पास थी। ऑडिट के अनुसार इस तरह सहायक अभियंता ने विभागीय निर्देशों का उल्लंघन किया और उच्चाधिकारियों की निर्धारित स्वीकृति से बचा।
2.70 करोड़ रुपये का व्यय, एक करोड़ का भुगतान
कैग ने इन 20 कार्यों की वित्तीय स्थिति का भी उल्लेख किया है। सितंबर 2024 तक इन कार्यों पर कुल 2.70 करोड़ रुपये का व्यय दर्ज किया गया था। इनमें एक करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका था, जबकि छह कार्य पूरे हो चुके थे। शेष कार्यों की स्थिति भी ऑडिट के दौरान दर्ज की गई।
जुलाई 2025 में विभाग ने स्वीकार की थी आपत्ति
इस मामले में विभाग की प्रतिक्रिया भी कैग रिपोर्ट का हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार संबंधित विभाग ने जुलाई 2025 में ऑडिट की इस आपत्ति को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इसके बाद संबंधित सहायक अभियंता के विरुद्ध कोई विभागीय कार्रवाई की गई या नहीं। यह भी जानकारी नहीं दी गई है कि सभी 20 कार्यों की गुणवत्ता, मापी और भुगतान की अलग से जांच कराई गई या नहीं।
विभाग द्वारा ऑडिट आपत्ति स्वीकार किए जाने के बाद अब यह जानना महत्वपूर्ण है कि क्या संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा गया, क्या तकनीकी स्वीकृति प्रक्रिया की समीक्षा हुई और क्या मामले में कोई कार्रवाई रिपोर्ट तैयार की गई। इन सवालों का जवाब जिला ग्रामीण विकास अभिकरण और ग्रामीण विकास विभाग से मिलना बाकी है।
23 जुलाई 2026 को विधानसभा में रखी गई रिपोर्ट
कैग की यह रिपोर्ट अब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि इसे 23 जुलाई 2026 को बिहार विधानमंडल के पटल पर रखा गया था। रिपोर्ट संख्या 01/2026 मार्च 2024 को समाप्त अवधि से संबंधित प्रदर्शन एवं अनुपालन ऑडिट पर आधारित है। इसे 16 अप्रैल 2026 को बिहार सरकार को भेजा गया था।
रिपोर्ट में ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत मनरेगा के क्रियान्वयन की जांच के दौरान कई स्तरों पर कमियां दर्ज की गई हैं। इनमें योजना निर्माण, कार्यों की स्वीकृति, मजदूरी भुगतान, परिसंपत्तियों के निर्माण और निगरानी व्यवस्था से संबंधित निष्कर्ष शामिल हैं। पूर्वी चंपारण के 20 कार्यों की तकनीकी स्वीकृति का मामला इन्हीं ऑडिट निष्कर्षों में से एक है।
अब जिला प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग से जवाब की दरकार
पूर्वी चंपारण के इस मामले में अब कुछ सीधे सवालों का जवाब सामने आना चाहिए। 20 कार्य किन पंचायतों में कराए गए थे? उनकी तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई? क्या संबंधित कार्यपालक अभियंता को इसकी जानकारी थी? जुलाई 2025 में ऑडिट आपत्ति स्वीकार किए जाने के बाद क्या विभागीय कार्रवाई हुई? क्या कार्यों की गुणवत्ता और भुगतान का पुनः सत्यापन कराया गया?
जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, मनरेगा और जिला ग्रामीण विकास अभिकरण से इन सभी बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। संबंधित कार्यों की सूची, तकनीकी स्वीकृति आदेश, मापी पुस्तिका, भुगतान विवरण और पूर्णता प्रमाणपत्र सार्वजनिक होने से मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी।
फिलहाल कैग की रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों ने पूर्वी चंपारण में मनरेगा की तकनीकी स्वीकृति प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। विभाग द्वारा आपत्ति स्वीकार किए जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करने की जिम्मेदारी किसकी तय हुई और उसके बाद क्या कार्रवाई की गई?
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स्रोत: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की बिहार सरकार संबंधी रिपोर्ट संख्या 01/2026, अध्याय 2, पैरा 2.5.12 के अंतर्गत तकनीकी स्वीकृति संबंधी ऑडिट निष्कर्ष, मुद्रित पृष्ठ 57-58।
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