2004 की बाढ़ ने बिहार को सिर्फ तबाही की तस्वीरें नहीं दी थीं। उसी बाढ़ के बीच एक युवा IAS अधिकारी ऐसा नाम बनकर उभरा, जिसकी चर्चा देशभर में हुई। फिर कुछ ही समय बाद उसी अधिकारी पर बाढ़ राहत के पैसे में गड़बड़ी का आरोप लगा और उसे जेल जाना पड़ा।
बिहार में बाढ़ का पानी उतर जाता है, लेकिन कुछ कहानियां नहीं उतरतीं।
करीब दो दशक पहले की एक ऐसी ही कहानी है गौतम गोस्वामी की।
आज जब सितंबर की बाढ़ में उत्तर बिहार की नदियां फिर उफान पर हैं और कोसी से लेकर चंपारण तक लोग पानी से जूझ रहे हैं, तो 2004 का वह साल याद आना स्वाभाविक है। इसलिए नहीं कि आज कोई वैसा मामला सामने आया है। ऐसा कोई दावा करना भी गलत होगा। बल्कि इसलिए कि उस समय बाढ़ राहत के बीच जिस IAS अधिकारी का नाम अचानक पूरे देश में चर्चा में आया था, कुछ ही वर्षों में उसकी कहानी बिहार के सबसे चर्चित प्रशासनिक मामलों में शामिल हो गई।
नाम था—गौतम गोस्वामी।
बाढ़ में काम करने वाला वह IAS अफसर
गौतम गोस्वामी 1991 बैच के IAS अधिकारी थे। 2004 में वे पटना के जिलाधिकारी थे।
उसी साल बिहार भयंकर बाढ़ की चपेट में था। बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे। सड़कें डूबी थीं, गांवों का संपर्क टूट गया था और राहत सामग्री पहुंचाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती थी।
इसी दौरान गोस्वामी के काम करने के तरीके की खूब चर्चा हुई।
राहत कार्यों की निगरानी, प्रभावित लोगों तक सामान पहुंचाने और प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय करने को लेकर उनकी छवि एक ऐसे अधिकारी की बनी, जो दफ्तर में बैठकर आदेश देने के बजाय मैदान में दिखाई देता था।
बाढ़ प्रभावित इलाकों में उनकी सक्रियता की चर्चा बिहार से बाहर तक पहुंची। 2004 में TIME Magazine ने उन्हें अपने ‘Asian Heroes’ में शामिल किया। बाद की रिपोर्टों में भी उनके राहत अभियान की व्यापक चर्चा हुई।
एक युवा IAS अधिकारी, बाढ़ में काम करने की चर्चा और फिर अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में नाम।
कहानी यहां तक होती तो शायद गौतम गोस्वामी बिहार के उन अधिकारियों में गिने जाते, जिनकी प्रशासनिक सक्रियता की मिसाल दी जाती।
लेकिन कहानी ने अचानक करवट ली।
बाढ़ उतरने के बाद उठे सवाल
2004 की बाढ़ खत्म हो चुकी थी। राहत का काम भी धीरे-धीरे सामान्य होने लगा।
लेकिन राहत सामग्री की खरीद और उसके लिए खर्च किए गए सरकारी पैसे को लेकर सवाल उठने लगे।
जांच आगे बढ़ी तो मामला सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया की खामी तक सीमित नहीं रहा। बाढ़ राहत के लिए उपलब्ध कराई गई राशि में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया।
अलग-अलग समकालीन रिपोर्टों में मामले की रकम करीब 17 से 18.5 करोड़ रुपये के बीच बताई गई। Indian Express की रिपोर्ट में 17.8 करोड़ रुपये की राशि का उल्लेख है, जबकि अन्य रिपोर्टों में 18.5 करोड़ रुपये तक का आंकड़ा दिया गया।
गौतम गोस्वामी समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ।
जिस अधिकारी की पहचान कुछ समय पहले बाढ़ राहत अभियान के चेहरे के तौर पर बन रही थी, अब वही बाढ़ राहत मामले में आरोपी था।
यह बदलाव इतना अचानक था कि बिहार ही नहीं, देशभर के प्रशासनिक हलकों में इसकी चर्चा होने लगी।
फिर IAS अधिकारी पहुंच गए जेल
मामला आगे बढ़ा और गौतम गोस्वामी को जेल जाना पड़ा।
वे करीब 15 महीने जेल में रहे। नवंबर 2006 में पटना हाईकोर्ट से उन्हें जमानत मिली।
यह कहानी इसलिए भी असाधारण थी क्योंकि मामला किसी सामान्य सरकारी खरीद का नहीं था। आरोप उस पैसे के इस्तेमाल से जुड़े थे जो बाढ़ जैसी आपदा में प्रभावित लोगों के लिए था।
बाढ़ में अपना घर गंवा चुका परिवार राहत की उम्मीद करता है। वहीं दूसरी तरफ राहत के लिए जारी सरकारी पैसे के इस्तेमाल पर सवाल खड़े हो जाएं तो मामला सिर्फ हिसाब-किताब का नहीं रह जाता। सवाल व्यवस्था के भरोसे का बन जाता है।
हालांकि किसी आरोपी के खिलाफ आरोप लगना और अदालत में दोष सिद्ध होना दो अलग बातें हैं। गौतम गोस्वामी का मामला भी इसी कानूनी प्रक्रिया से गुजरा।
जेल से बाहर आए, लेकिन जिंदगी ने ज्यादा वक्त नहीं दिया
नवंबर 2006 में पटना हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी।
जेल से बाहर आने के बाद जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश चल रही थी। लेकिन किस्मत ने ज्यादा समय नहीं दिया।
गौतम गोस्वामी कैंसर से जूझ रहे थे।
जनवरी 2009 में पटना के एक निजी अस्पताल में उनकी मौत हो गई। उम्र सिर्फ 41 साल थी।
यानी जिस अधिकारी ने कुछ साल पहले बाढ़ राहत के काम के कारण देशभर में पहचान बनाई थी, उसकी जिंदगी एक लंबे प्रशासनिक विवाद और बीमारी के बीच महज 41 वर्ष की उम्र में खत्म हो गई।
कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास
गौतम गोस्वामी की कहानी में शायद सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यही विरोधाभास है।
एक तरफ 2004 की बाढ़।
बाढ़ में सक्रियता।
प्रशासनिक काम की चर्चा।
TIME Magazine में नाम।
और दूसरी तरफ उसी बाढ़ की राहत व्यवस्था से जुड़ा मामला।
जेल।
फिर बीमारी।
और 41 साल की उम्र में मौत।
एक अधिकारी की पूरी कहानी कुछ ही वर्षों में इतनी तेजी से बदल गई कि आज भी 2004 की बाढ़ का जिक्र आते ही उनका नाम पुराने अखबारों और रिपोर्टों में सामने आ जाता है।
उस समय की जांच में क्या निकला था?
बाद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट में भी 2004 की बाढ़ राहत व्यवस्था से जुड़ी खरीद और प्रक्रियाओं में कई अनियमितताओं की ओर इशारा किया गया था।
राहत सामग्री की खरीद, सप्लाई और प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े सवाल उस समय की जांच का हिस्सा बने।
यानी मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था। उस दौर की पूरी राहत व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे थे।
यही वजह है कि गौतम गोस्वामी की कहानी को सिर्फ “एक IAS जेल गया” वाली खबर बनाकर देखना इस पूरे मामले को छोटा कर देना होगा।
असल कहानी यह थी कि आपदा के समय सरकारी व्यवस्था किस तरह काम करती है, राहत के लिए आया पैसा किस रास्ते से गुजरता है और उस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कितनी जरूरी होती है।
और आज चंपारण में फिर बढ़ रहा है पानी
करीब दो दशक बाद सितंबर 2026 में बिहार एक बार फिर बाढ़ के दौर से गुजर रहा है। गंडक के बढ़ते जलस्तर के बीच चंपारण के इलाकों में प्रशासन की सक्रियता बढ़ी हुई है।
DB Breakings की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक वाल्मीकिनगर बैराज से 4.04 लाख क्यूसेक डिस्चार्ज और नेपाल के देवघाट पर 5.25 लाख क्यूसेक से अधिक पानी दर्ज किया गया था।
गंडक में बढ़े पानी के दबाव और वाल्मीकिनगर बैराज के डिस्चार्ज की पूरी रिपोर्ट पढ़ें
पूर्वी चंपारण प्रशासन ने भी गंडक के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए तटबंधों, नाव, आश्रय स्थल, मेडिकल टीम और बचाव व्यवस्था को लेकर तैयारी तेज की है।
गंडक में बढ़ते पानी के बीच पूर्वी चंपारण प्रशासन की तैयारियों की खबर पढ़ें
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी डुमरिया घाट पहुंचकर गंडक और तटबंधों की स्थिति का जायजा लिया था।
डुमरिया घाट पर मुख्यमंत्री के निरीक्षण की पूरी खबर यहां पढ़ें
और अरेराज में रिंग बांध टूटने के बाद आसपास के गांवों में पानी फैलने की घटना ने स्थानीय स्तर पर बाढ़ प्रबंधन को लेकर एक अलग चिंता सामने रखी है। ग्रामीणों ने जल संसाधन विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाया है। यह आरोप ग्रामीणों के हैं; इसे विभाग की ओर से दोष सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अरेराज में तड़के टूटे रिंग बांध और गांवों में घुसे गंडक के पानी की पूरी खबर पढ़ें
यानी आज की बाढ़ और 2004 की घटना के बीच कोई सीधा संबंध निकालना ठीक नहीं होगा। 2026 की मौजूदा बाढ़ को लेकर फिलहाल ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है, जिससे इसे उस पुराने राहत घोटाले से जोड़ा जा सके।
आज का संदर्भ सिर्फ इतना है कि बाढ़ एक बार फिर बिहार के सामने है और करीब दो दशक पुरानी वह कहानी भी याद दिला रही है कि आपदा के समय राहत व्यवस्था कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है।
गौतम गोस्वामी की कहानी क्यों याद रह गई?
बिहार में हजारों IAS अधिकारी आए और गए। बहुतों का नाम कुछ वर्षों के बाद लोगों को याद भी नहीं रहता।
गौतम गोस्वामी का नाम अलग वजह से याद रह गया।
उनकी कहानी में एक साथ कई तस्वीरें हैं—
एक युवा IAS अधिकारी की तस्वीर।
बाढ़ में काम करते अधिकारी की तस्वीर।
राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने वाले अफसर की तस्वीर।
फिर बाढ़ राहत के मामले में आरोपी अधिकारी की तस्वीर।
जेल की तस्वीर।
बीमारी से लड़ते एक इंसान की तस्वीर।
और आखिर में सिर्फ 41 साल की उम्र में खत्म हो गई जिंदगी।
यही वह वजह है कि करीब दो दशक बाद भी गौतम गोस्वामी की कहानी जब सामने आती है तो पाठक रुककर पढ़ता है। यह सिर्फ एक पुराने घोटाले की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे IAS अधिकारी के उतार-चढ़ाव की कहानी है, जिसकी पहचान एक समय बाढ़ राहत के काम से बनी थी और बाद में उसी बाढ़ राहत व्यवस्था से जुड़े मामले ने उसके पूरे करियर को बदल दिया।
बाढ़ आती है, पानी चला जाता है… कहानियां रह जाती हैं
बिहार के लिए बाढ़ नई बात नहीं है। कोसी हो या गंडक, हर साल पानी अपने साथ नई मुश्किलें लेकर आता है।
लेकिन कुछ घटनाएं समय के साथ भी पुरानी नहीं होतीं। गौतम गोस्वामी की कहानी उन्हीं में से एक है।
2004 की बाढ़ में एक युवा IAS अधिकारी देश की नजर में आया था। कुछ ही समय बाद उसी अधिकारी को राहत राशि से जुड़े मामले में जेल जाना पड़ा। जमानत मिली। बीमारी ने घेरा और 2009 में 41 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।
आज 2026 में जब चंपारण और उत्तर बिहार के कई हिस्सों में फिर पानी बढ़ रहा है, तब उस कहानी को याद करना किसी मौजूदा घटना पर आरोप लगाना नहीं है।
बस एक पुराना पन्ना फिर खुल गया है।
बाढ़ की कहानी पुरानी है। पानी हर साल नया होता है। लेकिन बाढ़ से जुड़ी कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिन्हें समय भी नहीं बहा पाता। गौतम गोस्वामी की कहानी उन्हीं में से एक है।
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