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दुनिया फिर युद्ध की तैयारी में? यूक्रेन के हमले से लेकर परमाणु हथियारों तक बढ़ता तनाव

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दुनिया फिर युद्ध की तैयारी में? यूक्रेन के हमले से लेकर परमाणु हथियारों तक बढ़ता तनाव

खबर व संपादन: धीरज श्रीवास्तव

कवर स्टोरी | 20 सितंबर 2026
रूस पर यूक्रेन का अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला, लेकिन कहानी सिर्फ रूस-यूक्रेन तक सीमित नहीं

दुनिया एक बार फिर ऐसे दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है, जहां युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ाई नहीं रह गया है। ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें, साइबर क्षमता, अंतरिक्ष आधारित सैन्य तकनीक, परमाणु हथियार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—सैन्य शक्ति की परिभाषा तेजी से बदल रही है।

20 सितंबर 2026 को यूक्रेन ने रूस के खिलाफ बड़े पैमाने पर ड्रोन हमला किया। रूसी अधिकारियों के अनुसार रूस के अलग-अलग हिस्सों में 1,000 से अधिक ड्रोन भेजे गए, जबकि करीब 450 ड्रोन मॉस्को की दिशा में थे। मॉस्को क्षेत्र में दो लोगों की मौत और 20 लोगों के घायल होने की सूचना सामने आई है। मॉस्को की एक प्रमुख तेल रिफाइनरी को भी नुकसान पहुंचा।

उधर उसी दौरान रूस के हमले में यूक्रेन के कीव क्षेत्र में एक मां और उसके दो तीन वर्षीय बच्चों समेत चार लोगों की मौत की सूचना मिली। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2026 में यूक्रेन में कम से कम 372 नागरिक मारे गए और 2,349 घायल हुए। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच नागरिक हताहतों की संख्या 2025 की इसी अवधि की तुलना में 55 प्रतिशत अधिक रही।

यानी युद्ध खत्म होने के बजाय उसका स्वरूप और अधिक तकनीकी, दूर तक मार करने वाला और महंगा होता जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या दुनिया बड़े युद्ध की तैयारी कर रही है?

सीधे तौर पर यह कहना कि दुनिया किसी नए विश्वयुद्ध की तैयारी कर रही है, उपलब्ध आंकड़ों से साबित नहीं होता। लेकिन सैन्य खर्च, हथियारों की खरीद, परमाणु आधुनिकीकरण और विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा तैयारियों के आंकड़े यह जरूर दिखाते हैं कि दुनिया के कई बड़े देश लंबे समय के लिए अधिक अस्थिर सुरक्षा माहौल को ध्यान में रखकर अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहे हैं।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SIPRI के अनुसार 2025 में दुनिया का कुल सैन्य खर्च बढ़कर करीब 2.887 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया। यह लगातार 11वां साल था जब वैश्विक सैन्य खर्च बढ़ा। वैश्विक GDP में सैन्य खर्च की हिस्सेदारी 2.5 प्रतिशत रही, जो 2009 के बाद सबसे ऊंचे स्तरों में है।

दुनिया के बड़े सैन्य खर्च करने वाले देश

देश| 2025 सैन्य खर्च


  • अमेरिका| $954 अरब
    चीन| करीब $336 अरब
    रूस| करीब $190 अरब
    जर्मनी| $114 अरब
    भारत| $92.1 अरब
    ब्रिटेन| $89 अरब
    यूक्रेन| करीब $84.1 अरब
    सऊदी अरब| करीब $83.2 अरब
    फ्रांस| $68 अरब
    जापान| $62.2 अरब

    SIPRI के अनुसार अमेरिका, चीन और रूस ने अकेले 2025 में करीब 1.48 ट्रिलियन डॉलर सैन्य क्षेत्र में खर्च किए—दुनिया के कुल सैन्य खर्च का लगभग 51 प्रतिशत।

    भारत भी इस तस्वीर में महत्वपूर्ण है। 2025 में भारत का सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़कर 92.1 अरब डॉलर पहुंचा और भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश रहा।

    यूरोप में सबसे बड़ी सैन्य तैयारी

    रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा नीति को सबसे ज्यादा बदला है।
    SIPRI के अनुसार 2025 में यूरोप का सैन्य खर्च 14 प्रतिशत बढ़कर 864 अरब डॉलर पहुंच गया। यूरोपीय NATO देशों ने मिलकर करीब 559 अरब डॉलर खर्च किए।
    NATO ने 2025 में एक और बड़ा फैसला किया। सदस्य देशों ने 2035 तक GDP का 5 प्रतिशत रक्षा और उससे जुड़े सुरक्षा खर्चों पर लगाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसमें कम से कम 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा जरूरतों और अधिकतम 1.5 प्रतिशत व्यापक रक्षा-सुरक्षा एवं बुनियादी ढांचे से जुड़े खर्चों के लिए रखा गया है।

    यूरोपीय संघ के आंकड़ों के मुताबिक 2026 में EU सदस्य देशों का कुल रक्षा खर्च अनुमानित 454 अरब यूरो तक पहुंच सकता है। यह 2021 की तुलना में 75.3 प्रतिशत अधिक होगा। 2026 में रक्षा निवेश करीब 163 अरब यूरो रहने का अनुमान है।

    परमाणु हथियारों की दुनिया भी बदल रही है

    सबसे गंभीर तस्वीर परमाणु हथियारों की है।

    SIPRI के 2026 आकलन के अनुसार जनवरी 2026 में दुनिया में लगभग 12,187 परमाणु हथियार मौजूद थे। इनमें करीब 9,745 सैन्य स्टॉकपाइल में संभावित इस्तेमाल के लिए थे और लगभग 4,012 हथियार मिसाइलों या विमानों के साथ तैनात थे।

    करीब 2,100–2,200 तैनात परमाणु हथियार उच्च परिचालन अलर्ट पर रखे गए थे। इनमें लगभग सभी अमेरिका या रूस के थे।

    अमेरिका और रूस के पास मिलकर दुनिया के लगभग 83 प्रतिशत सैन्य स्टॉकपाइल परमाणु हथियार हैं।

    लेकिन तीसरी बड़ी शक्ति तेजी से आगे बढ़ रही है—चीन।

    SIPRI का अनुमान है कि चीन के पास करीब 620 परमाणु हथियार हैं और उसका परमाणु भंडार दुनिया के अन्य परमाणु देशों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। चीन ने उत्तर में बड़े मिसाइल साइलो क्षेत्रों में सैकड़ों मिसाइलें स्थापित की हैं।

    इसके साथ भारत और पाकिस्तान भी अपनी परमाणु क्षमताओं का आधुनिकीकरण कर रहे हैं। यानी परमाणु शक्ति का संतुलन केवल अमेरिका-रूस तक सीमित नहीं रह गया है।

    युद्ध का नया चेहरा: हजारों सैनिक नहीं, हजारों ड्रोन

    यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्ध की एक बड़ी तस्वीर सामने रखी है।

    20 सितंबर के हमले में रूस ने 1,000 से ज्यादा यूक्रेनी ड्रोन के आने का दावा किया। मॉस्को की ओर भेजे गए करीब 450 ड्रोन का आंकड़ा भी सामने आया है।

    दूसरी तरफ रूस लगातार ड्रोन और मिसाइलों से यूक्रेन के शहरों और बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहा है।

    यूक्रेन में अगस्त 2026 के नागरिक हताहतों में 47 प्रतिशत की वजह लंबी दूरी के मिसाइल और ड्रोन हमले रहे। इसका अर्थ है कि युद्ध का खतरा अब केवल सीमा के पास रहने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। राजधानी और दूसरे बड़े शहर भी युद्ध के प्रभाव क्षेत्र में हैं।

    मिसाइलों की होड़ और कमजोर होती रक्षा-व्यवस्था

    मिली जानकारी के अनुसार रूस ने 2026 में यूक्रेन के खिलाफ पुराने प्रशिक्षण मिसाइलों को भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना शुरू किया है। जुलाई और अगस्त की शुरुआत के दौरान दर्ज 228 बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइल हमलों में आधे से अधिक में RM48U जैसी कम सटीक लेकिन घातक मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ।

    इससे युद्ध का एक और पहलू सामने आता है—देश केवल नए अत्याधुनिक हथियार नहीं बना रहे, बल्कि पुराने हथियारों को भी नए तरीके से युद्ध में शामिल कर रहे हैं।

    अंतरिक्ष भी अब अगला मोर्चा?

    सितंबर 2026 में अमेरिका ने पहली बार पृथ्वी की कक्षा में अपने कुछ हथियारों के अस्तित्व को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। अमेरिकी अधिकारियों ने इन्हें अंतरिक्ष नियंत्रण से संबंधित रक्षात्मक क्षमता बताया, जबकि चीन और रूस ने इस घटनाक्रम पर चिंता जताई।

    इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में युद्ध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र अंतरिक्ष भी हो सकता है—जहां सैटेलाइट, संचार, GPS और सैन्य निगरानी प्रणालियां किसी भी संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    रूस-यूक्रेन युद्ध क्यों ज्यादा खतरनाक चरण में पहुंच रहा है?

    इस समय तीन समानांतर चीजें दिखाई दे रही हैं—

  • पहली: रूस यूक्रेन पर लगातार हवाई और मिसाइल हमले कर रहा है।

    दूसरी: यूक्रेन की लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता बढ़ रही है और अब रूस के भीतर महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता दिखाई दे रही है।

    तीसरी: यूरोप और NATO अपनी रक्षा क्षमता में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं।

  • यानी युद्ध का प्रभाव केवल रूस और यूक्रेन की सीमाओं तक नहीं रह गया है।

    क्या तीसरा विश्वयुद्ध करीब है?

    उपलब्ध आंकड़े ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

    लेकिन एक दूसरी बात साफ है—दुनिया में सैन्य तैयारी का स्तर बढ़ रहा है।

    सैन्य बजट बढ़ रहे हैं। यूरोप में हथियारों की खरीद तेज हुई है। चीन अपनी सैन्य और परमाणु क्षमता का विस्तार कर रहा है। रूस युद्धकालीन अर्थव्यवस्था और सैन्य उत्पादन को बनाए हुए है। अमेरिका परमाणु और पारंपरिक दोनों क्षमताओं का आधुनिकीकरण कर रहा है। एशिया में भी जापान, भारत और अन्य देशों के रक्षा बजट बढ़ रहे हैं।

    इसलिए मौजूदा स्थिति को “विश्वयुद्ध शुरू होने की पुष्टि” कहना गलत होगा।

    लेकिन इसे केवल एक सामान्य हथियारों की खरीद भी नहीं कहा जा सकता।

    दुनिया की बड़ी शक्तियां ऐसी सुरक्षा व्यवस्था तैयार कर रही हैं जिसमें उन्हें लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष, ड्रोन युद्ध, मिसाइल हमले, साइबर हमले, अंतरिक्ष आधारित टकराव और परमाणु जोखिम—सभी को ध्यान में रखना पड़ रहा है।

    भारत के लिए इसका क्या मतलब?

    भारत सीधे रूस-यूक्रेन युद्ध का पक्षकार नहीं है, लेकिन वैश्विक सैन्य तनाव का असर भारत तक पहुंच सकता है।

    तेल की कीमत, समुद्री व्यापार, रक्षा आयात, यूरोप और रूस के साथ व्यापार, खाद्य एवं उर्वरक आपूर्ति और वैश्विक बाजार—इन सभी पर बड़े सैन्य संघर्ष का असर पड़ सकता है।

    भारत पहले ही दुनिया के सबसे बड़े सैन्य खर्च करने वाले देशों में शामिल है। 2025 में उसका सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर रहा।

    भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू चीन है। चीन का 2025 का सैन्य खर्च अनुमानित 336 अरब डॉलर था—भारत के मुकाबले लगभग 3.6 गुना।

    इसका अर्थ यह नहीं कि भारत युद्ध की ओर बढ़ रहा है, बल्कि यह कि भारत को बदलते सुरक्षा वातावरण में अपनी रक्षा, सीमा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, साइबर क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर लगातार ध्यान देना पड़ रहा है।

    चंपारण और बिहार तक इसका असर कैसे पहुंच सकता है?

    पूर्वी चंपारण की भौगोलिक स्थिति इस कहानी को स्थानीय महत्व देती है। नेपाल की सीमा से लगे इलाकों के कारण किसी बड़े क्षेत्रीय या वैश्विक सुरक्षा संकट की स्थिति में सीमा निगरानी, आवागमन, व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था पर प्रशासन की नजर बढ़ सकती है।

    लेकिन अभी ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पूर्वी चंपारण या बिहार पर तत्काल सैन्य खतरा पैदा हो गया है।

    असर यदि आता है तो उसके शुरुआती रूप अधिक संभावना से ईंधन की कीमत, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला और सीमा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में दिखाई देंगे।

    निष्कर्ष: युद्ध की घोषणा नहीं, लेकिन तैयारी का दौर जरूर

    20 सितंबर 2026 का मॉस्को पर बड़ा ड्रोन हमला एक प्रतीकात्मक घटना है।

    एक तरफ रूस के भीतर सैकड़ों ड्रोन पहुंच रहे हैं, दूसरी तरफ यूक्रेन के शहरों पर रूसी हमले जारी हैं। यूरोप अपने रक्षा बजट बढ़ा रहा है। NATO ने 2035 तक 5 प्रतिशत GDP का नया लक्ष्य तय किया है। चीन तेजी से अपनी सैन्य और परमाणु क्षमता बढ़ा रहा है। दुनिया में परमाणु हथियारों की कुल संख्या अभी भी 12 हजार से ज्यादा है।

    इन सबको जोड़कर देखें तो तस्वीर यह नहीं कहती कि तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है।

    तस्वीर यह कहती है कि दुनिया लंबे समय से चल रहे एक नए सैन्य-सुरक्षा दौर में प्रवेश कर चुकी है—और रूस-यूक्रेन युद्ध उसका सबसे बड़ा दिखाई देने वाला मोर्चा है।

    आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि हथियारों पर बढ़ता खर्च सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है या फिर दुनिया को एक और बड़ी हथियारों की दौड़ की ओर ले जाता है।

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