गुरुवार को जिलेभर में निर्माण और शिल्पकला के देवता भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना जारी, संस्थानों व प्रतिष्ठानों में उत्साह।
मोतिहारी और पूर्वी चंपारण जिले के विभिन्न क्षेत्रों में आज गुरुवार को भगवान विश्वकर्मा की पूजा पूरे श्रद्धा और धूमधाम के साथ आयोजित की जा रही है। निर्माण, शिल्पकला और वास्तुकला के देवता माने जाने वाले भगवान विश्वकर्मा की आराधना को लेकर सुबह से ही विभिन्न औद्योगिक संस्थानों, वर्कशॉप, दुकानों, गैरेज, फैक्ट्रियों और निर्माण स्थलों पर विशेष तैयारियों के साथ पूजा-अर्चना का दौर जारी है।
धार्मिक मान्यताओं और भारतीय परंपराओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम शिल्पकार और महान वास्तुकार माना जाता है। सनातन धर्म में किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य, औजार, मशीनरी, वाहन और तकनीकी उपकरणों के सुचारू संचालन तथा प्रगति के लिए उनकी पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन विशेष रूप से लोहे के उपकरणों, मशीनों, गाड़ियों और कल-कारखानों की साफ-सफाई की जाती है तथा भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न की जाती है।
पूर्वी चंपारण जिले के मुख्य शहर मोतिहारी से लेकर विभिन्न प्रखंडों और ग्रामीण इलाकों में विश्वकर्मा पूजा का व्यापक उत्साह देखा जा रहा है। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, गैरेज, बिजली विभागों, तकनीकी संस्थानों और सर्विस सेंटरों में विशेष पूजा पंडाल सजाए गए हैं। कारीगर, शिल्पकार, ड्राइवर, इंजीनियर और मजदूर वर्ग के लोग इस दिन अपनी आजीविका के साधनों की पूजा कर बेहतर कार्य-कुशलता, सुरक्षा और समृद्धि की कामना कर रहे हैं।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने ही देवताओं के अस्त्र-शस्त्र, महलों और भव्य पौराणिक नगरियों का निर्माण किया था। प्राचीन कथाओं में स्वर्ग लोक, द्वारका नगरी, हस्तिनापुर और लंका जैसी विशाल व सुंदर संरचनाओं के निर्माण का श्रेय भगवान विश्वकर्मा को ही दिया जाता है। इसी कारण प्राचीन काल से ही शिल्पकारों, वास्तुकारों और सभी प्रकार के निर्माण कार्य से जुड़े लोगों के लिए यह दिन अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है।
विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर वाहनों, कल-पुर्जों और मशीनों को विशेष रूप से फूलों और मालाओं से सजाया जाता है। पूजा के दौरान औजारों और यंत्रों पर तिलक लगाकर अक्षत और धूप-दीप अर्पित किए जाते हैं। कई जगहों पर इस दिन मशीनों का उपयोग न करने और उन्हें विश्राम देने की परंपरा का पालन भी किया जाता है। पूर्वी चंपारण जिले में इस पर्व को लेकर हर वर्ग में उत्साह है और पूजास्थलों पर दर्शन-पूजन के बाद प्रसाद वितरण का आयोजन भी किया जा रहा है।

