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दुर्गा खोटे: जिस बहू के फिल्मों में आने पर उठे सवाल, वही बनीं सिनेमा की यादगार जोधाबाई

1931 में फिल्मों में आने पर जिस पढ़ी-लिखी बहू पर समाज ने सवाल उठाए, वही दुर्गा खोटे आगे चलकर तारामती और जोधाबाई बनीं और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार तक पहुंचीं।

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दुर्गा खोटे: शोहरत के उस पार
मूल तस्वीरें: दुर्गा खोटे (1938) व दुर्गा खोटे, विकिमीडिया कॉमन्स, पब्लिक डोमेन
🎬 शोहरत के उस पार | सीरीज की कहानी

खबर: अनीता चौधरीसंपादन व प्रकाशन: धीरज श्रीवास्तव

1931 में एक मूक फिल्म आई, ‘फरेबी जाल’। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली, लेकिन उसमें छोटा-सा किरदार निभाने वाली एक युवती को समाज की कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी। वजह उनका अभिनय नहीं, उनका परिवार था। उस दौर के लोगों के लिए ये मानना मुश्किल था कि बंबई के एक प्रतिष्ठित घर की पढ़ी-लिखी बहू फिल्मों में काम करे।

उस युवती का नाम था दुर्गा खोटे। आगे चलकर वो हिंदी और मराठी सिनेमा की सबसे सम्मानित अभिनेत्रियों में गिनी गईं। ज़्यादातर लोग उन्हें ‘मुगल-ए-आज़म’ में जोधाबाई के किरदार से जानते हैं, लेकिन उस पहचान तक पहुंचने का रास्ता कहीं ज़्यादा दिलचस्प है।

संपन्न घर की बेटी, फिर कमाने की ज़रूरत

दुर्गा खोटे का जन्म 14 जनवरी 1905 को बंबई के एक संपन्न और प्रगतिशील लाड परिवार में हुआ। शादी से पहले उनका नाम वीटा था। उन्होंने कैथेड्रल हाई स्कूल में पढ़ाई की और फिर बी.ए. के लिए सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज पहुंचीं। उस ज़माने में किसी लड़की का कॉलेज तक पहुंचना आम बात नहीं थी।

करीब 18 साल की उम्र में उनकी शादी मुंबई के प्रतिष्ठित खोटे परिवार में विश्वनाथ खोटे से हुई, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़े मैकेनिकल इंजीनियर थे। ससुराल में उन्हें नया नाम मिला: दुर्गा। 1925 में बड़े बेटे बकुल और 1927 में छोटे बेटे हरिन का जन्म हुआ।

फिर खोटे परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ने लगी। दो छोटे बच्चों की परवरिश सामने थी। दुर्गा ने खुद कमाने का फैसला किया और घर पर अंग्रेज़ी की ट्यूशन पढ़ाने लगीं।

बहन ने मना किया, दुर्गा ने हामी भर दी

फिल्मों में उनका आना संयोग था। एक मूक फिल्म में छोटे किरदार का प्रस्ताव पहले उनकी बहन शालिनी के पास आया था। शालिनी ने मना किया और अपनी बहन का नाम सुझा दिया। दुर्गा ने हां कह दी।

यही फिल्म थी ‘फरेबी जाल’। फिल्म नहीं चली और उस दौर के समाज ने इसे अच्छी नज़र से नहीं देखा। तब ऊंचे घरों की महिलाओं का फिल्मों में काम करना ठीक नहीं माना जाता था। इसका असर उनकी ट्यूशन कक्षाओं पर भी पड़ा। फिर भी सिनेमा के प्रति उनका आकर्षण कम नहीं हुआ।

और इसी फिल्म ने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की नज़र में ला दिया, जिसने उनकी किस्मत बदल दी। वो थे प्रभात फिल्म कंपनी के वी. शांताराम।

तारामती ने बदल दिया रास्ता

शांताराम ने दुर्गा को प्रभात की पहली मराठी बोलती फिल्म ‘अयोध्येचा राजा’ (1932) में रानी तारामती का किरदार दिया। ये फिल्म हिंदी में ‘अयोध्या का राजा’ नाम से भी बनी। दुर्गा ने ये प्रस्ताव तभी स्वीकार किया, जब उनके पिता ने कुछ शर्तें रखीं और ये पक्का किया कि सेट पर महिलाओं के साथ सम्मान से पेश आया जाएगा।

कोल्हापुर में शूटिंग हुई। शांताराम ने खुद उनके मराठी और हिंदी उच्चारण पर मेहनत करवाई, चलने-बोलने से लेकर अभिनय की बारीकियों तक। फिल्म ज़बरदस्त हिट रही और तारामती के रूप में दुर्गा दर्शकों की चहेती बन गईं।

1930 के दशक में ‘सैरंध्री’ (1933) और ‘अमर ज्योति’ (1936) जैसी फिल्मों ने उनकी पहचान और मज़बूत की। जिस पृष्ठभूमि पर कभी सवाल उठे थे, वही अब दूसरी महिलाओं के लिए फिल्मों का रास्ता आसान बनाने लगी।

जोधाबाई की पहचान से कहीं बड़ा काम

1941 में हिंदी-मराठी फिल्म ‘चरणों की दासी’ में उन्होंने एक कठोर सास का किरदार निभाया और इसकी खूब तारीफ हुई। ये चरित्र भूमिकाओं की ओर उनका बड़ा कदम था। इसके बाद दशकों तक वो पर्दे पर मां, सास और रानी के किरदारों में दिखती रहीं।

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1960 में ‘मुगल-ए-आज़म’ में जोधाबाई का किरदार उनके करियर की सबसे यादगार भूमिकाओं में शामिल हो गया। बाद में ‘कर्ज़’ में भी उनकी मां वाली भूमिका याद की जाती है।

पर्दे के बाहर भी वो रुकी नहीं। वो इप्टा (IPTA) से जुड़ीं और मराठी नाटक ‘राजमुकुट’ में लेडी मैकबेथ बनीं।

1968 में उन्हें पद्मश्री मिला। भारत सरकार के फिल्म समारोह निदेशालय के रिकॉर्ड में वो 1983 के दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की विजेता के रूप में दर्ज हैं।

पर्दे की मां के अपने दुख

पति विश्वनाथ खोटे का निधन कम उम्र में हो गया और दोनों बेटों की परवरिश की ज़िम्मेदारी दुर्गा पर आ गई। बड़े बेटे बकुल एयर इंडिया में ऊंचे पद तक पहुंचे। छोटे बेटे हरिन का 1964 में निधन हो गया। हरिन की पत्नी विजया आगे चलकर जानी-मानी रंगमंच और टीवी निर्देशक विजया मेहता के नाम से मशहूर हुईं।

1982 में दुर्गा खोटे ने मराठी में अपनी आत्मकथा ‘मी, दुर्गा खोटे’ लिखी। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद शांता गोखले ने किया, जो ‘आई, दुर्गा खोटे’ नाम से प्रकाशित हुआ। आत्मकथा में उन्होंने अपनी ज़िंदगी का हिसाब लगाते हुए लिखा कि सारी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और गलतियों के बाद जो बचता है, वो संतोष है।

22 सितंबर 1991 को दुर्गा खोटे का निधन हो गया। जिस कदम पर कभी उनके दौर के समाज ने उंगली उठाई थी, वही कदम आने वाली पीढ़ियों की अभिनेत्रियों के लिए सम्मान का रास्ता बना।

यह भी पढ़ें: शोहरत के उस पार: एक फिल्म में आठ किरदार निभाने वाली सुलोचना की कहानी

स्रोत: फिल्म समारोह निदेशालय, भारत सरकार, द प्रिंट, दुर्गा खोटे जीवनी पोर्टल (महाभूषण), सिनेमाज़ी।

खबर: अनीता चौधरी
संपादन व प्रकाशन: धीरज श्रीवास्तव

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