क्राइम फाइल | पूर्वी चंपारण
13 मार्च 2011 की वह रात, जब पूर्वी चंपारण के दरमाहा में पुलिस और माओवादियों के बीच 12 से 14 घंटे तक चली मुठभेड़ ने पूरे इलाके को दहला दिया था। छह माओवादी मारे गए, हथियारों का बड़ा जखीरा मिला और इसके बाद सामने आया था—‘छह के बदले साठ’ का बदला।
क्राइम फाइल: दरमाहा की इस मुठभेड़ को सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई के तौर पर देखना अधूरा होगा। करीब 100 माओवादियों का जुटना, तीन स्तर की घेराबंदी, बांसवाड़ी से लगातार गोलियां, 400 से ज्यादा राउंड की फायरिंग, घंटों चला ऑपरेशन, हथियारों का जखीरा और उसके बाद बदले की धमकी—यह पूरी कहानी कई अनसुलझे सवाल छोड़ती है।
मोतिहारी: मार्च 2011 की वह रात आज भी जेहन में बिल्कुल साफ है। मैं उस समय दैनिक आज के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। दरमाहा में पुलिस और माओवादियों के बीच मुठभेड़ शुरू हो चुकी थी और घटनास्थल से करीब आधा किलोमीटर पहले ही पत्रकारों को रोक दिया गया था।
आगे जाना संभव नहीं था, लेकिन वहां खड़े होकर गोलियों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। रात बढ़ती जा रही थी और फायरिंग लगातार जारी थी। अंधेरे में सामने क्या हो रहा था, यह आंखों से देख पाना मुश्किल था, लेकिन वायरलेस पर लगातार मिल रही सूचनाएं बता रही थीं कि पुलिस और माओवादियों के बीच सीधा मुकाबला चल रहा है।
दूसरी तरफ बांसवाड़ी थी। इसी दिशा से माओवादियों की ओर से लगातार फायरिंग की जा रही थी। पुलिस ने इलाके को चारों तरफ से घेर रखा था। उस रात मोर्चे पर सिर्फ स्थानीय पुलिस नहीं थी, बल्कि CRPF, STF, SAP और BMP समेत कई सुरक्षा बलों की टुकड़ियां मौजूद थीं।
तीन तरफ से घेरा, कसबा टोला में जुटे थे करीब 100 माओवादी
पुलिस को सूचना मिली थी कि करीब 100 माओवादी दरमाहा के कसबा टोला में जुटे हैं। समकालीन रिपोर्टों के अनुसार वे वहां करीब दो दिनों से छिपे हुए थे। सूचना मिलते ही सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके को तीन स्तर के घेरे में ले लिया।
CRPF, STF, SAP और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीम ने इलाके की घेराबंदी की। बाद में पटना से STF की अतिरिक्त टीम भी वहां पहुंची। ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया और सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन शुरू किया।
यह कोई सामान्य तलाशी अभियान नहीं था। सामने हथियारों से लैस एक बड़ा माओवादी दस्ता था और सुरक्षा बलों को अंदेशा था कि वे किसी बड़े ऑपरेशन की तैयारी में जुटे हैं।
दोपहर करीब 3 बजे शुरू हुई गोलियों की बौछार
पूर्वी चंपारण के तत्कालीन SP गणेश कुमार ने तब मीडिया को बताया था कि सुरक्षा बलों का ऑपरेशन करीब दोपहर 3 बजे शुरू हुआ। इसके बाद दरमाहा का शांत इलाका अचानक गोलियों की आवाज से गूंज उठा।
मेरी मौजूदगी घटनास्थल से कुछ दूरी पर थी। पत्रकारों को आगे जाने से रोक दिया गया था, लेकिन बांसवाड़ी की दिशा से लगातार गोलियां चलने की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। कुछ देर फायरिंग धीमी पड़ती तो फिर अचानक गोलियों की बौछार शुरू हो जाती।
उस रात सबसे बेचैन करने वाली चीज थी लगातार सुनाई देती गोलियों की आवाज। बाहर से सिर्फ आवाजें आ रही थीं, लेकिन हर कुछ देर में वायरलेस पर मिल रही जानकारी बता रही थी कि ऑपरेशन बेहद गंभीर स्थिति में है।
400 से ज्यादा राउंड माओवादियों ने चलाए
इस मुठभेड़ की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऑपरेशन में शामिल CRPF के जूनियर कमांडेंट विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बाद में बताया था कि माओवादियों ने 400 से ज्यादा राउंड फायर किए।
उनके मुताबिक जवाब में सुरक्षा बलों ने करीब 100 राउंड फायर किए। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई के बाद माओवादी पीछे हटने लगे और अपने कुछ साथियों के शव वहीं छोड़कर भाग गए।
मोर्चे पर खुद थे SP गणेश कुमार
इस पूरे ऑपरेशन की एक खास बात यह थी कि तत्कालीन पूर्वी चंपारण के SP गणेश कुमार खुद ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे थे। समकालीन मीडिया रिपोर्टों में भी इसकी पुष्टि मिलती है।
मेरी आंखों के सामने पुलिस अधिकारियों और जवानों की गतिविधियां लगातार बदल रही थीं। सुरक्षा बल अपनी-अपनी पोजीशन बदल रहे थे और वायरलेस पर निर्देशों का आदान-प्रदान जारी था। SP गणेश कुमार बख्तरबंद वाहन में आगे के मोर्चे पर मौजूद थे।
यह सिर्फ पीछे बैठकर ऑपरेशन की निगरानी करने वाला अभियान नहीं था। अधिकारी खुद अग्रिम मोर्चे पर थे और पूरी कार्रवाई को दिशा दे रहे थे।
12 से 14 घंटे तक चली मुठभेड़, सुबह 4 बजे थमा संघर्ष
दरमाहा की मुठभेड़ कितनी देर चली, इसे लेकर समकालीन रिपोर्टों में समय को लेकर थोड़ा अंतर मिलता है। एक रिपोर्ट इसे 14 घंटे लंबी मुठभेड़ बताती है, जबकि पुलिस से जुड़े एक अन्य विवरण में इसे 12 घंटे से अधिक बताया गया और कहा गया कि संघर्ष सोमवार की सुबह करीब 4 बजे समाप्त हुआ।
यानी 13 मार्च की दोपहर करीब 3 बजे शुरू हुआ यह ऑपरेशन रातभर चलता रहा और 14 मार्च की सुबह तक गोलियों की गूंज सुनाई देती रही।
मेरे लिए भी वह रात इसी वजह से असाधारण थी। अंधेरे में घटनास्थल दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन लगातार आती फायरिंग और वायरलेस पर चल रही सूचनाएं बता रही थीं कि ऑपरेशन लंबा खिंच चुका है।
छह माओवादी मारे गए, पुलिस जवान भी घायल
सुबह होते-होते ऑपरेशन का परिणाम सामने था। मुठभेड़ में छह माओवादी मारे गए। समकालीन रिपोर्टों में माओवादियों की गिरफ्तारियों का भी उल्लेख है। एक रिपोर्ट में दस गिरफ्तारियों की बात कही गई, जबकि दूसरे पुलिस विवरण में आठ गिरफ्तारियों का उल्लेख मिलता है।
इस कार्रवाई में SAP जवान शिव शरण यादव के घायल होने की जानकारी भी सामने आई थी। एक समकालीन रिपोर्ट में दो पुलिसकर्मियों के घायल होने का उल्लेख है, इसलिए इस बिंदु पर अलग-अलग रिपोर्टों में अंतर मिलता है।
ऑपरेशन का नतीजा: छह माओवादी मारे गए, समकालीन रिपोर्टों में आठ से दस गिरफ्तारियों का उल्लेख मिला, पुलिस पक्ष के जवान घायल हुए और बड़ी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद तथा विस्फोटक सामग्री बरामद हुई।
सुबह का वह दृश्य आज भी याद है
लेकिन इस पूरी घटना की सबसे अलग तस्वीर मेरे लिए अगली सुबह की थी।
रातभर चले ऑपरेशन के बाद जब सुबह सुरक्षा बलों के अधिकारी और जवान वापस लौट रहे थे तो उनकी थकान साफ दिखाई दे रही थी। SP गणेश कुमार के पैरों में जूते नहीं थे और पैर कीचड़ से सने हुए थे।
CRPF के अधिकारी और जवान भी रातभर की कार्रवाई के बाद बुरी तरह थके हुए नजर आ रहे थे। किसी के चेहरे पर रातभर की नींद नहीं थी, तो कोई लगातार ऑपरेशन के बाद भी अपने साथियों और हथियारों की स्थिति देख रहा था।
चेहरे पर थकान थी, लेकिन ऑपरेशन के सफल होने का संतोष भी साफ दिखाई दे रहा था।
रातभर मोर्चे पर रहने के बाद भी अधिकारियों के चेहरे पर एक अलग तरह का संतोष था। यह सिर्फ एक मुठभेड़ खत्म होने का संतोष नहीं था, बल्कि एक बड़े ऑपरेशन के सफल होने का एहसास था।
14 हथियार और एक हजार से ज्यादा राउंड
मुठभेड़ के बाद बरामद हथियारों ने सुरक्षा एजेंसियों को भी चौंकाया। समकालीन रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षा बलों ने कुल 14 हथियार बरामद किए।
इनमें पांच SLR, आठ पुलिस राइफल और एक .315 राइफल शामिल थी। रिपोर्ट के अनुसार आठ राइफलें पहले पुलिस से लूटी गई थीं।
इसके अलावा सुरक्षा बलों ने एक हजार से अधिक राउंड गोला-बारूद, विस्फोटक, डेटोनेटर, बम और अन्य सामग्री भी बरामद की।
दूसरी समकालीन रिपोर्ट में 13 अत्याधुनिक हथियारों का उल्लेख मिलता है, जिनमें पांच SLR शामिल थीं। यानी हथियारों की संख्या को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों में अंतर जरूर है, लेकिन यह साफ था कि माओवादियों के पास बड़ी संख्या में हथियार और भारी मात्रा में गोला-बारूद था।
तत्कालीन SP गणेश कुमार का संकेत: बरामद हथियार और सामग्री से यह आशंका मजबूत हुई थी कि माओवादी जिले के अंदर या बाहर किसी बड़े विध्वंसक ऑपरेशन की तैयारी में थे।
कौन थे मुठभेड़ में मारे गए छह माओवादी?
बाद में पुलिस ने मारे गए छह माओवादियों की पहचान की। इनमें राम अयोध्या राम उर्फ डॉक्टर सबसे महत्वपूर्ण नाम था। उसे सब-जोनल कमांडर बताया गया था और उसके जिम्मे मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और वैशाली इलाके की जिम्मेदारी होने की बात सामने आई थी।
बाकी मृतकों की पहचान सरोज, किशन, सुमित उर्फ नवीन, पवन और प्रमोद के रूप में हुई थी। इनके तार मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और सारण सहित उत्तर बिहार के अलग-अलग इलाकों से जुड़े बताए गए थे।
यानी दरमाहा में मारा गया दस्ता सिर्फ स्थानीय स्तर का समूह नहीं था। उसके सदस्य और नेतृत्व उत्तर बिहार के कई जिलों से जुड़े हुए थे।
मुसाफिर सहनी का नाम बाद में क्यों आया?
दरमाहा ऑपरेशन की कहानी में एक नाम बाद की खुफिया रिपोर्टों के कारण महत्वपूर्ण हो जाता है—मुसाफिर साहनी।
यहां एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। उपलब्ध समकालीन रिकॉर्ड में ऐसा विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता कि मुसाफिर साहनी दरमाहा की उस मुठभेड़ में मौजूद था या वह मारे गए छह माओवादियों में शामिल था।
उसका नाम बाद की खुफिया और सुरक्षा रिपोर्टों में सामने आता है। अप्रैल 2011 की एक रिपोर्ट में दरमाहा मुठभेड़ के बाद माओवादी प्रतिशोध की आशंका, सरकारी अधिकारियों के अपहरण की संभावित योजना और जिले के कुछ महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर खतरे की चर्चा की गई थी। उसी संदर्भ में मुसाफिर साहनी समेत कुछ अन्य नामों का उल्लेख हुआ था।
इसलिए दरमाहा की घटना से मुसाफिर साहनी का संबंध बाद की सुरक्षा/खुफिया गतिविधियों के संदर्भ में देखना ज्यादा सही है, न कि मुठभेड़ के प्रत्यक्ष भागीदार के रूप में।
छह के बदले साठ—जब सड़कों पर मिले धमकी भरे पर्चे
दरमाहा ऑपरेशन खत्म होने के बाद कहानी खत्म नहीं हुई। करीब दो सप्ताह बाद बदले की धमकी सामने आई।
30 मार्च 2011 को प्रकाशित एक समकालीन रिपोर्ट के मुताबिक मोतिहारी के कई इलाकों में माओवादी पर्चे मिले थे। इन पर्चों में लिखा था—“छह के बदले साठ”।
संदेश साफ था—दरमाहा में मारे गए छह साथियों की मौत का बदला 60 पुलिसकर्मियों की हत्या करके लिया जाएगा।
6 → 60
बदले की धमकी: दरमाहा में मारे गए छह साथियों की मौत का बदला लेने के लिए 60 पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने की धमकी।
इस धमकी के बाद भारत-नेपाल सीमा पर भी सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। सीमा पर तैनात जवानों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए थे, क्योंकि आशंका थी कि माओवादी सीमा पार आवाजाही का इस्तेमाल कर सकते हैं।
और फिर SP गणेश कुमार को आया धमकी भरा SMS
मई 2011 में इस कहानी का एक और महत्वपूर्ण अध्याय सामने आया। 26 मई 2011 की एक रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन पूर्वी चंपारण SP गणेश कुमार को मोबाइल पर धमकी भरा SMS मिला था।
यही संदेश एक हिंदी दैनिक के पत्रकार को भी भेजा गया था। संदेश में SP को धमकी दी गई थी कि अगर उनके साथियों पर अत्याचार बंद नहीं किया गया तो खुले युद्ध के लिए तैयार रहें। एक अन्य संदेश में तीन दिन के भीतर SP गणेश कुमार को मारने की धमकी दी गई थी।
गणेश कुमार ने खुद धमकी वाला संदेश मिलने की पुष्टि की थी। हालांकि उन्होंने इसे निश्चित रूप से माओवादियों की करतूत मानने से इनकार किया था और इसे कुछ अपराधियों की हरकत भी बताया था। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी।
एक जरूरी तथ्य: यह कहना सही नहीं होगा कि SMS निश्चित रूप से माओवादियों ने ही भेजा था। उपलब्ध समकालीन रिपोर्ट में इसे माओवादी धमकी के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन SP गणेश कुमार ने इसका नक्सल कनेक्शन पर संदेह जताया था।
दरमाहा की रात आखिर किस तैयारी का हिस्सा थी?
अब करीब डेढ़ दशक बाद पीछे मुड़कर देखने पर दरमाहा की उस रात से जुड़े कई टुकड़े एक-दूसरे से जुड़ते नजर आते हैं।
एक तरफ करीब 100 माओवादियों का किसी गांव में जुटना, दूसरी तरफ तीन स्तर का पुलिस घेरा, बांसवाड़ी से लगातार फायरिंग, माओवादियों की ओर से 400 से अधिक राउंड चलना, सुरक्षा बलों की करीब 100 राउंड जवाबी फायरिंग, घंटों चला ऑपरेशन और पुलिस से लूटे गए हथियारों की बरामदगी।
इसके बाद छह माओवादियों की मौत, गिरफ्तारियां, 14 हथियार, एक हजार से अधिक राउंड गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री की बरामदगी।
फिर कुछ ही सप्ताह बाद सामने आया—“छह के बदले साठ” का बदला। और मई में तत्कालीन SP गणेश कुमार के मोबाइल पर आया जान से मारने की धमकी वाला SMS।
इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो एक सवाल आज भी कायम है—
आखिर दरमाहा में माओवादी इतनी बड़ी संख्या में हथियार और विस्फोटक लेकर किस बड़े ऑपरेशन की तैयारी कर रहे थे?
उपलब्ध दस्तावेज और समकालीन रिपोर्टें इस सवाल की ओर इशारा तो करती हैं, लेकिन उस संभावित लक्ष्य का अंतिम और निर्विवाद जवाब सामने नहीं रखतीं। यही वजह है कि दरमाहा की वह रात आज भी पूर्वी चंपारण के सबसे रहस्यमय और चर्चित माओवादी ऑपरेशनों में गिनी जाती है।
स्रोत/संदर्भ: मार्च–मई 2011 की समकालीन मीडिया रिपोर्टें, पुलिस कार्रवाई से जुड़े सार्वजनिक विवरण तथा लेखक का प्रत्यक्ष रिपोर्टिंग अनुभव।
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